2 फरवरी 2020 को है भीमाष्टमी व्रत, जानिए कथा एवं इतिहास

भीमाष्टमी व्रत माघ माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। तदानुसार, 2 फरवरी 2020 को भीमाष्टमी व्रत मनाया जायेगा। महाभारत महाकव्य अनुसार इस दिन महाभारत के महापुरुष भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु प्राप्त हुई थी। भीष्म पितामह बाल ब्रह्मचारी और कौरव के पूर्वजों के नाम से भी जाना जाता है। bhishma ashtami vrat katha

भीष्माष्टमी के दिन महापुरुष भीष्म के नाम से पूजन और तर्पण करने से वीर और सत्यवादी संतान की प्राप्ति होती है। भीष्म पितामह के पिता राजा शांतनु थे जबकि इनकी माता भगवती गंगा थी। पिता के चाह के कारण महापुरुष भीष्म पितामह आजीवन अविवाहित थे इसी कारण से इनका नाम भीष्म पड़ा।

भीष्माष्टमी व्रत कथा

महाभारत कथा के अनुसार गंगा पुत्र देवव्रत की माता देवी गंगा अपने पति को दिए हुए वचनानुसार अपने पुत्र को अपने साथ ले गयी थी। देवव्रत अर्थात भीष्म की प्रारम्भिक शिक्षा तथा लालन-पालन इनकी माता के पास पूरा हुआ। देवव्रत महर्षि परशुराम जी से शस्त्र विद्या प्राप्त किया। जब देवव्रत अर्थात पितामह भीष्म ने सभी शिक्षा प्राप्त कर लिया तब माता गंगा ने देवव्रत को उनके पिता को सौप दिया। कई वर्षो के पश्चात पिता-पुत्र का मिलन हुआ। राजा शांतनु ने पुत्र देवव्रत के शिक्षा का परीक्षा लिया जिसे देवव्रत ने अपने शौर्य कला से जीत लिया।

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तत्पश्चात, राजा शांतनु ने अपने पुत्र को युवराज घोषित कर दिया। एक बार राजा शांतनु शिकार के लिए घने जंगल में गए जहाँ राजा शांतनु पथ से भटक गए और इधर-उधर भटकने लगे। अँधेरा छाने लगा परन्तु राजा शांतनु लौट कर सम्राज्य नही आये जिससे युवराज देवव्रत चिंतित हो उठे और पिता की खोज में जंगल की ओर निकल पड़े। अँधेरे में राजा शांतनु भटकते-भटकते एक आश्रम के पास जा पहुंचे जहाँ उन्हें रात्रि पनाह मिला। रात्रि विश्राम के समय उनकी मुलाकात सत्यवती नामक युवती से जिनके रूप-सौंदर्य पर राजा शांतनु मोहित हो गए।

राजा शांतनु ने युवती से विवाह के प्रस्ताव को पस्तुत किया परन्तु युवती ने इस सन्दर्भ में युवती के पिता से बात करने के लिए कहा। राजा शांतनु ने युवती के पिता को इस प्रसंग के बारे में बताया तब युवती के पिता ने एक शर्त पर विवाह के प्रस्ताव को मंजूर किया की विवाह के पश्चात उसके पुत्री का संतान ही सम्राज्य का राजा बनेगा। शर्त से सहमत है तो मैं अपनी पुत्री की शादी आपसे करवा दूंगा। राजा शांतनु को यह शर्त स्वीकार नही था।

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अगले दिन जब पुत्र देवव्रत को इस सम्बन्ध में जानकारी हुई तो उन्होंने पिता के सुख के सामने अपने सर्वस्व इच्छा को त्याग दिया तथा आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने का प्रतिज्ञा लिया। देवव्रत की प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर अपने पुत्र देवव्रत को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। कालांतर में भीष्म पितामह को पांच पांडवो के विरुद्ध युद्ध करना पड़ा तथा इस युद्ध में भीष्म पितामह घायल हो गए। भीष्म पितामह 18 दिनों तक मृत्यु शैया पर पड़े रहे तथा जब सूर्य उत्तरायण हुआ तब भीष्म पितामह ने अपना प्राण त्यागा। bhishma ashtami vrat katha

भीष्माष्टमी व्रत की पूजा विधि तथा महत्व

भीष्माष्टमी को करने से प्रितदोष से मुक्ति मिलती है तथा पुत्र की प्राप्ति होती है। व्रती को इस दिन व्रत करने के साथ-साथ भीष्म पितामह की आत्मा की शांति के लिए भी तर्पण करना चाहिए। भीष्माष्टमी को व्रती को कुश, तिल, जल से भीष्म पितामह का तर्पण करना चाहिए। इससे व्रती को सभी पापो से मुक्ति मिलती है। भीष्माष्टमी व्रत भीष्म पितामह की स्मृति में मनाया जाता है। इस तरह भीष्माष्टमी व्रत कथा सम्पन्न हुआ। प्रेम से बोलिए महापुरुष भीष्म पितामह की जय।