29 जून से प्रारम्भ होगी अमरनाथ यात्रा,जानिए कथा एवं इतिहास

Amarnath Yatra Devotional History hindi




अमरनाथ यात्रा को हिन्दू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण यात्रा माना जाता है। बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए देश भर से लोग कश्मीर पहुंचते है। इस वर्ष अमरनाथ यात्रा 29 जून से प्रारम्भ होगी, जोकि 7 अगस्त तक चलेगी। Amarnath Yatra Devotional History hindi

वेदों, पुराणों एवम शास्त्रों के अनुसार जब भगवान विष्णु क्षीर सागर में शयन करने चले जाते है और चार माह पश्चात देव उत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागृत अवस्था में अाते है। इन चार महीनों में भगवान महादेव की पूजा की जाती है। अतः सावन महीना शिव जी को समर्पित है। इसी माह में भगवान महादेव पवित्र स्थल अमरनाथ में बर्फ रूप में अवतरित होते है। Amarnath Yatra Devotional History hindi

सत्यम शिवम सुन्दरम शिव ही सत्य है। शिव का अर्थ हैं कल्याणकारी। भगवान शिव आदि अनादि में समाहित रहते है। शिव जिनके दर्शन मात्र से ही समस्त पाप, सन्ताप,  दुख, दरिद्र भष्म हो जाते हैं और महापुण्य, दीर्धायु के साथ सभी मनोकामनायें पूर्ण होती है। बर्फानी शिवलिंग के दर्शन से महापुण्य की प्राप्ति होती है और जो मनुष्य उनका पूजन करता है वह महायज्ञ के समान माना जाता है।

कहा जाता है कि अमरनाथ यात्रा करने से करोड़ों जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते है। रूद्रदेव बाबा अमरनाथ बर्फानी विशाल हिम शिखरों के बीच भव्य गुफा में अपने भक्तों पर करूणा बरसाने के लिए लिंग रूप में विरजमान हैं । बाबा अमरनाथ की यात्रा से मनुष्य के अन्दर एक नवीन उर्जा का आह्वान होता है और जीवन मानो नवीन हो जाता हैं। Amarnath Yatra Devotional History hin

अमरनाथ जी की यात्रा श्रद्धा, भाव, विश्वास एवं दृढ संकल्प के बिना पूरी नही की जा सकती हैं।

अमरनाथ यात्रा का शुभारम्भ तवी नदी के किनारे बसे जम्मू तवी शहर से होता है। कहा जाता है कि सन 1835 में महाराजा गुलाब सिंह ने रधुनाथ मंदिर का निर्माण शुरू करवाया था, परन्तु किसी कारणवश कार्य पूरा नहीं हो सका। फिर राजा रणबीर सिंह ने रघुनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। इस भव्य मंदिर की कलाकृति अपने में अनुठा उदाहरण पेश करती है, यहॉ का वातावरण मानो आपको अमृत पान करवा रही है।

सन 1820 में जम्मुलोचन किले के अंदर बनी काली मंदिर आस्था श्रदा भाव के मद्देनजर काफी प्रभावशाली  है। मां के दर्शन आरती घंटी शंख आदि को सुन मन तृप्त हो जाता है। अमरनाथ यात्रा का रजिस्ट्रेशन भी यहीं से होता है। रजिस्ट्रेशन कराने के बाद यात्री आगे कि ओर बढ़ जाते हैं।

सड़क के दोनो ओर चीड़ के पेड, उॅंचें उॅंचे पर्वत श्रृंखलाओं से होते हुए हम उधमपुर पहुॅंचते हैं। यहॉ के सुंदररानी मंदिर में विशाल चटृानों पर निर्मित शिवलिंग, यहॉ की सुंदरता मे चार चॉद लगा देता है।

उधमपुर से आगे बढ़ कर पटनीटॅाप हिल स्टेशन में खान-पान के साथ-साथ सैलानियों के घुमने के लिए दर्शनीय स्थान है। उॅंचें उॅंचे पेड़ व पहाड़ की गोद से निकलती हुयी झरने व नदी देख स्वतः हीं यहॉ स्नान करने का मन करता है। यहॉ यात्री थोड़ा विश्राम कर प्रकृति का आनंद लेते हुए पुनः अपने मंजिल की और बढने लगते है। उपर पहाड़ नीचे खाई के बीच बम बम भोले के जयकारों के साथ बटोत, रामबण, बनिहाल की सुन्दर घाटियाँ पर्वत झीलें पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

काजीकुंड में जलपान और विश्राम की उत्म व्यवस्था हैं । श्रदालु यहाँ प्रकृति की गोद में जलपान का आन्नद उठाते है। यहॉं श्रदालुओं की सेवा करते सेवादार आपको एहसास नहीं होने देंगे की आप अपने घर से सैकड़ो मील दुर हैं। कहते है भगवान शिव के भक्तो की सेवा करना शिव के सेवा करने के समान हैं और भला शिव की सेवा करना कोई क्यों छोडेंगा ? यही कारण है कि सेवादार तन-मन धन से यात्रियों की सेवा करते है।




इसके आगे हम अनंतनाग पहुँचते हैं।

कहा जाता है कि शिव जी नें इस स्थान पर अपने नाग छोडे थे इसलिए इस जगह का नाम अनंतनाग पड गया।यहॉ सें हमारी सड़क यात्रा 26 किमी रह जाती है। अनंतनाग से दो रास्ते निकलते है। एक श्रीनगर को जाता है और दूसरा पहलगाम को जाता है, पहलगाम की समुद्र से उचाई 7200 फीट की दुरी पर है।

पहलगाम के बारे में कहा जाता हैं कि भगवान शिव माँ पार्वती कों अमर कथा सुनाने के लिए जाते समय अपने बैल को यहीं छोड गये थे इसलिए इस जगह का नाम बैल गाँव पडा जो बाद में पहलगॉव कहलाने लगा। सेवादरों द्वारा यहाँ पर यात्रियों के विश्राम की उतम वयवस्था की जाती हैं। यहाँ के सेवादार निःस्वार्थ तन मन धन से यात्रियों की सेवा करते हैं। Amarnath Yatra Devotional History hindi

पहल गाँव से 16 किलोमिटर की दूरी पर चंदनबाडी स्थित है। यहाँँ की सुंदरता का अदभुत नजारें हैं, ऊँचे- ऊँचे पर्वत शिखर ठंडी-ठंडी हवाएँ आत्म बुद्धि व मन को शीतल कर देती है। चंदनबाडी के संबंध में माना जाता हैं कि भगवान शिव माँ पार्वती कों अमर कथा सुनाने के लिए जाने वक्त चंद्रमा को यही पर छोड गए थे । इसलिए यहाँ का नाम चंदनबाडी पडा।

अमर कथा के बारे में कहा जाता है की एक बार भगवान शिव माता पार्वती के साथ र्कीडा कर रहे थे। उनका मुख माता पार्वती के नेत्रों से स्पर्श होने के कारण काला पड गया तो उन्होंने अपना मुख नीलगंगा में धोया था। तभी से अंजन के प्रभाव से इस नदी के जल का रंग नीला पड गया। जो श्रद्धालु सच्चे मन से नीलगंगा में स्नान करते है उनको शिवधाम की प्राप्ति होती है।

आगे बढ़ने पर भगवान शिव पिस्सु घाटी पर विश्राम कर रहे थे यह समाचार सुनकर दूर-दूर से देवता व राक्षस शिव के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठे। पहले कौन शिव जी का दर्शन करेगा, इस पर युद्ध छिड गया और देवताओं की संख्या कम हाने के कारण वे हारने लगे। देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की।

भगवान शिव के स्तुति के कारण उनमें नवीन शक्ति का संचार हुआ जिससे उन्होनें सभी राक्षसों को मार गिराया और उनकी हडियों को पीस पीस कर चूरा बनाकर उसका ढेर लगा दिया। इसी लिए यहॉ का नाम पिस्सु टॉप पडा

पिस्सु टॉप की ऊचाई समुद्री तल से 11, 500 फीट है। पिस्सुटॉप की गगनचुम्बी चढाई पर एक-एक कदम संभाल के रखना पडता है। खडी चढाई यही से शुरू हो जाती है, रास्ता अति दुर्गम होने के साथ-साथ टेढ़ी मेढ़ी सर्पकार, पथरीला, चक्रनुमा तो कहीं उबड-खाबड है जिसे बिना महादेव की कृपा से चढाई मानों असंभव है।

रास्ते में बम बम भोले और ऊँ नमः शिवाय का सुमिरन सुनकर मन भक्तिमय और शक्तिदायक हो जाता है और श्रद्धालु इस दुरगम चढाई को पार कर शेषनाग पहुॅचते हैं।

शेषनाग की समुद्री तल से ऊॅचाई  12, 500 फीट है। यहाँ से अमरनाथ गुफा तक की यात्रा 13 किमी रह जाती है । यह अत्यंत रमणीय स्थान है। प्रकृति के अनमोल नजारें ऊँचे ऊँचे पर्वतों पर बादलों ठहराव, झील और चारों तरफ हरयाली देख मनमुग्ध हो जाता है।

कहा जाता हैं एक बलवान राक्षस शेषनाग के समीप पर रहता था, यह राक्षस पर्वत की तरह आकृति और महान बलशाली दुष्ट देवताओं और पृथ्वी वासियों पर घोर अत्याचार करता था। जिससे देवता तंग आकर भगवान शिव के पास गये । भगवान शिव ने उस राक्षस को दीर्धायु का वरदान दिया था।

देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव ने उन्हें भगवन विष्णु के पास जाने को कहा। भगवान विष्णु ने पाताल लोक से शेषनाग जी को बुलाया और शेषनाग ने अपने अद्वितीय शक्ति से उस राक्षस का वध किया। दैत्यों पर शेषनाग जी की इसी जीत के कारण ही इस जगह का नाम शेषनाग पड़ा।

महागुण स्टॉप Amarnath Yatra Devotional History hindi

महागुण स्टॉप समुद्री तल से 14, 800 फिट ऊॅचाई पर स्थित है। इसे गणेश टॉप भी कहते है । यहॉ पर हिमनदियों तथा हिम पर्वतों का बडा अदभूत संगम है।

कहा जाता है भगवान शिव पार्वती को अमर कथा सुनाने के लिए गणेश जी को यहीं पर छोड गए थें। इसलिए इस स्थान का नाम गणेश टॉप पडा।

यात्रा का अगला पडाव आता हैं पंचतरिणी । यहॉ से अमरनाथ गुफा की यात्रा 6 किमी रह जाती हैं । यह समुद्र तल से 11, 500 फुट उचाई पर है। यहाँ बर्फीली हवा चलती रहती है। यहाँ का मौसम कब बिगड जायेें पता नहीं चलता ।

भुस्खलन, हिमपात यहाँ होते रहतें है। सुरक्षा के लिए जम्मू कश्मीर टूरिज्म बोर्ड तथा अमरनाथ श्राईन बोर्ड द्वारा यात्रियों की सहायता के लिए जगह जगह कैम्प लगाये हुए हैं। यात्रियो को हमारी सलाह है की वे अपनें जरूरत का समान और सुरक्षा के पुख्ता इन्तजाम कर के ही यात्रा करें।

पंचतरणी के सम्बन्ध में कहा जाता है की भगवान शिव यहां ताडव नृत्य कर रहे थे तभी उनकी जटायें ढीली पड गयी और उसमें से माँ गंगा निकली जो पाँच धाराओ में बट गयी थी। आज भी पाँच धाराओं की गंगा आपकों यहाँ देखने को मिलती हैं। कहा जाता हैं पंचतरिणी में स्नान करनें से शिवधाम की प्राप्ति होती हैं। पंचतरिणी मे भगवान शिव नें पंचतत्व अग्नि,  जल,  वायु,  पृथ्वी और नभ का परित्याग किया था।

 संगम टॉप Amarnath Yatra Devotional History hindi

संगम टॉप समुद्र तल सें 13, 500 फिट की ऊँचाई पर स्थित हैं। संगम टॉप से अमरनाथ की यात्रा 3 किमी रह जाती हैं। पहलगाम और बालटन से होकर आने वाले मार्गो का यह संगम स्थल हैं। इसलिए इसे संगम टॉप कहते है। प्रकृति का अदभूत नजारा कहीं धूप, कहीं हिम पवनें, ऊँचें शिखर, नदियाँ एक लुभावना दृष्य तैयार करते हैं जिससें यात्रियों के मन में नई स्फूर्ति का संचार होता हैं। बम बम भेाले ऊँ नमः शिवाय का गुणगान करते हुए श्रद्धालु अमरनाथ गुफा पहुॅच जातें है।

अमनाथ हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल हैं। यह जम्मू कश्मीर के श्रीनगर के उतर पूर्व में स्थित हैं। इस की समुद्र तल सें ऊँचाई 16, 600 फुट है। अमरनाथ गुफा की लम्बाइ 19 मीटर व चौडाई 16 मीटर है जबकि ऊँचाई 11 मीटर हैं।  यहॉ की विषेशता पवित्र गुफा में हिमलिंग का निर्मित होना है। अमरनाथ गुफा की परिधि लगभग 150 फुट हैं।

आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षा बंधन तक पुरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिय लाखों लोग यहाँ आते हैं। Amarnath Yatra Devotional History hindi

अमरनाथ के दर्शन से पूर्व अमरावती नदी में स्नान करना पावन माना जाता हैं। एक बार समस्त देवता जीवन मृत्यु से परेशान होकर योगेश्वर भगवान शिव के पास पहुचें । उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की कि उन्हें जिसके लिए उनहोनें सिर पर शुभोसित चन्द्रमा को अपनी सुक्ष्म शक्ति से निचोडा जिससे अमृत की जो धारा निकली वहीं अमरावती है। इसमे पवित्र मन से स्नान करने से सारी मनोकामनाये पूर्ण हो जाती हैं।

अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धर्मिक स्थलोें में सें एक है क्योकि यहीं भगवान शिव जी ने माँ पार्वती को अमरकथा सुनाई थी।

चन्द्रमा के बढने घटने के साथ साथ इस बर्फ का आकार भी घटता बढता रहता हैं। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार मे आ जाता हैं। और अमावस्या तक धीरे धीरे छोटा होता जाता हैं। आश्चर्य की बात यह है कि शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि गुफा मे आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा कर गिर जाती है।

अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश भैरव आर पार्वती के ही अलग अलग हिमखंड है।

अब आइयें आपको सुनाते है अमरकथा जिसे सुन संत सुखदेव जी अमर हो गये थे। एक बार भगवान शिव मृगछाला पर विराजमान संघ्याकालीन नित्या मे लीन थे। माता पार्वती नीलकंठ के सौम्य रूद्र रूप ललाट पर सुभोशित चन्द्रमा गले मे रूद्र वृक्ष के फलों से निर्मित रूद्राक्ष की माला, शेषनाग, त्रिशूल और मुख पर स्वर्ण शीतल मुस्कुराहट देख मुस्कुरा उठी। । भगवान के गले मुंड माला देख अचंभित हो उठी।

उनके मन में अनेक मनोचित में अनेक प्रश्न उठे। उन्होने भगवान शिव से मुंड माला धारण करने का रहस्य पूछा। भगवान शिव ने बताया कि मानव शरीर  नाशवान हैं। जब आपकी मृत्यु होती है और जब आपका नया जन्म होता है। तो वह मुंडी अपने मुंड माला में स्वतः धारण कर लेते है।

मुंड माला धारण करने का रहस्य जानकर माता पार्वती ने शिव से अमरत्व का रहस्स पूछा जिससे भगवान शिव अमर है। माता पार्वती के नित्य आग्रह से भगवान शिव ने अमरकथा सुनाने का निर्णय लिया जिसके प्रभाव से आदमी अमर हो जाता है।

भगवान शिव किसी भी सांसारिक प्राणी को अमरकथा सुनाना नहीं चाहते थे। इसलिए भगवान शिव माता पार्वती को एकांत में कैलाश पर्वत पर ले गये।  अमरकथा के प्रभाव से प्राणी अमर हो जाता हैं। जीवन मरण का बेला से मुक्त हो जाता है। उन्होंने कालागणी रूद्र नामक गण को प्रकट किया और आदेश दिया कि गुफा के आस-पास कोई भी सांसारिक प्राणी जीवित नहीं रहना चाहिए।

आदेशानुसार गण नें समस्त जीवधारी प्राणियों को खत्म कर दिया। परन्तु दुर्भाग्य से एक कबुतर के अुडे पर उसका प्रभाव नहीं पडा क्योंकि वह उस समय जीवधारी नहीं था। निःसंदेह भगवान माता पार्वमी को आखे मूंद कथा सुनाने लगें । निश्चित समयानुसार कबुतर के अण्डे से एक कबुतर का जन्म हुआ। अमर कथा माता पार्वती और कबुतर दोनो सुन रहे थे। माता पार्वती कथा सुनने का प्रमाण हुंकार के साथ दे रहीं थी। Amarnath Yatra Devotional History hindi

धीरे धीरे माता पार्वती को निद्रा ने घेर लिया। माता पार्वती को निद्रा मे देख कबुतर प्रत्येक वाक्य के अंत में हुंकारी देने लगा। भगवान शिव नेत्र मुंद ध्यान मग्न हो के अमरकथा सुना रहे थे। Amarnath Yatra Devotional History hindi

कथा समाप्त होने पर  भगवान शिव ने माता पार्वती को निद्रा मे देखा। भगवान शिव के पूछने पर माता पार्वती ने बताया की द्रव रूप के कारण निद्रा ने घेर लिया था और वह अचेत होकर सो गयी थी। निद्र के प्रभाव के कारण वह संम्पूर्ण कथा भी सुन नहीं सकी। क्रोध व्यक्त करते हुए भगवान शिव ने माता पार्वती से हुंकार देने की लिए पूछा इसके लिए भी माता पार्वती ने मना कर दिया । Amarnath Yatra Devotional History hindi

भगवान शिव का संदेह परिपक्व हो गया कि कथा सुनने वाला संसारिक प्राणी है। भगवान शिव के आक्रोश पर मृत्यु से भयभीत होकर कबूतर प्राण रक्षा के लिए त्र्रीव वेग से गुफा सें भागा । भय से व्यथित कबुतर को तीनों लोक में कही छिपने का स्थान नहीं मिला। संयोग जो भय से व्याकुल कबुतर की नजर व्यासदेव की पत्नी पर पडी । अपने ऑगन में बैठी जमांही ले रहीं थी। Amarnath Yatra Devotional History hindi

प्रदोष व्रत की कथा एवम इतिहास

व्याकुल कबुतर को कोई और मार्ग नजर नहीं आया। अंततः वह व्यास देव की पत्नी के मुख के रास्ते पेट में प्रवेश कर गया। भगवान शिव का क्रोध और गर्जन सुन व्यास देव और उनकी पत्नी घर से बाहर आयें। भगवान शिव ने पूछा कोई चोर उनके घर के अंदर तो नहीं गया। सत्य से अज्ञात व्यास देव ने बताया  उन्होने किसी भी चोर को घर के अंदर प्रवेश करते हुय नहीं देखा। व्यास देव जी की पत्नी बोली थोड़ी देर पूर्व जमाहीं लेते हुए उन्हें ऐसा प्रतीत हुए कि कोई कबुतर उनके मुख के रास्ते पेट में प्रवेश कर गया है। Amarnath Yatra Devotional History hindi

 कबुतर अमरकथा सुनकर ज्ञानी और महापंडित हो गया ।

भगवान शिव ने बताया की कबुतर ही उनका चोर है। पश्चाताप करते हुए व्यास जी ने कहा की उनहें सत्य का ज्ञान नहीं था। और वह उचित निर्णय ले सकते है। भगवान शिव ने कबुतर को मारने का भाव प्रकट किया। पत्नी के मृत्यु से भयभित व्यास देव शिव जी से बोले कि स्त्री हत्या पाप है ।  व्यास देव की बात सुनकर शिव जी का मन करूणा से भर गया।और उन्होनें शीघ्र कैलाश पर्वत जाने का निर्णय लिया। Amarnath Yatra Devotional History hindi

कबुतर अमरकथा सुनकर ज्ञानी और महापंडित हो गया । कबूतर के कई वर्ष  पेट में रहने से व्यास देव जी की पत्नी के उदर में पीडा होने लगी। अपनी पत्नी के पीडा से व्यथित व्यास देव भगवान ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मा ने उन्हें विष्णु के पास और विष्णु ने शिव के पास भेजा। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु व व्यास तीनों शिव से प्रार्थना की कि दुर्गम पीडा का कोई सरल उपाय बतायें।

तीनों देव व्यास के घर पहुचे। और कबुतर से जन्म लेने का आग्रह किया। ज्ञानवान कबूतर संसार की दशा जानता था अपितु जन्म लेना नहीं चाहता था। कबुतर ने त्रिदेवों से अनुरोध किया कि आदिदेव यह संसार मोह से पीडित हैं। निर्माही संसार का ज्ञात कर मै स्वयं जन्म लूंगा।

कबूतर ने मानव रूप् में जन्म लिया

यह सुनकर सृश्टि के पालनहार विष्णु ने अपार शक्ति से संसार को निर्मोही बना दिया। संसार में सभी प्राणियों की निमोहिता सुनिश्चित कर कबूतर ने मानव रूप् में जन्म लिया।व्यास जी की पत्नी से पैदा हुए नवजात शिशु का नाम सुखदेव रखा गया। सुखदेव बाल अवस्था से ही अत्यंत प्रभावशाली बालक थे। अमरत्व के प्रभाव से उनमे असधारण वृद्धि हुई और वह शीघ्र ही घर त्याग कर चल दिये।

र्निमोहिता के प्रभाव से माता- पिता के रोकने पर भी वह नहीं रूके। तत्पश्चात भगवान विश्णु ने संसार को पूर्व की भांति मोह युक्त बना दिया। मोह युक्त माता -पिता  पुत्र मोह के विरह से रह नहीं पायें। सुखदेव को घर लाने की आशा से वह निर्जन वन में सुखदेव से मिलने गये। Amarnath Yatra Devotional History hindi

सुखदेव जी ने कहा कि संसार र्निमोही है यहा कोइ किसी का पिता नहीं है और कोई किसी का पुत्र नहीं । सुखदेव जी की बात सुनकर व्यास जी ने बताया कि सृष्टि पालनहार भगवान विष्णु ने अपनी शक्ति के प्रभाव से संसार को मोह युक्त बना दिया हैं। वेद व्यास जी की इस बात पर धैर्य व्यक्त करते हुुए सुखदेव जी ने शिक्षा दिक्षा प्राप्त करने के पश्चात घर लौटने का वचन दिया। Amarnath Yatra Devotional History hindi

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