छठ पूजा का महत्व एवं इतिहास history and importance-of-chatha-puja

chath-pooja-wallpaper-largeछठ महापर्व परमात्मा के प्रत्यक्ष पूजा का सर्व श्रेष्ठ उदाहरण है। छठ पूर्णतया प्रकृति रूपी परमेश्वर के द्धारा मानव को दिए गए विशेष वरदानों को पाने का पावन पर्व है। इस पवित्र ब्रत के नियम बड़े ही कठिन हैं। प्राकृतिक वस्तुओं से परम पिता सूर्य नारायण एवं जगतमाता ,भाग्यविधाता छठी मैया की आराधना श्रद्धालु बड़े ही श्रद्धा से पवित्रता पूर्वक मनाते हैं। छ दिनों तक चलने वाला त्यौहार आध्यात्मिक,भौतिक ,,प्राकृतिक ,सामाजिक , राजनैतिक एवं धार्मिकता के प्रत्यक्ष दर्शन दुनिया वालों को इस अवसर करवाती है। अपने विराट छवि के कारण छठ की छटा अनायास ही अपने आस पास की प्रवृर्ति को प्रकीर्ति अपनेआप अपनी ओऱ आकर्षित करता नजर आता है।

जन्म के 6 दिन बाद जिस विधि विधाता की पूजा सनातन धर्म के आधार पर की जाती है उसी को छठ मैया कहते हैं। छठ की महिमा या ,इसकी महानता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है की इसमें सापेक्ष रूप से प्रकासपुंज आदित्य देव को दीप दिखा कर उनकी आरती उतारते हैं। कार्तिक महीना में मनाया जाने वाला यह त्यौहार नदियों और तालाबों को एक तीर्थ के रूप में दो दिन के लिए प्रत्यक्ष रूप में परिणत कर देते है। प्रकृति से प्रकृति को प्रकृति के लिए परमात्मा का विधि विधान के साथ किया जाने वाला यह ब्रत वास्तव में वैज्ञानिकता की कसोटी पर शत प्रतिशत खड़ी उतरती है। अन्य पर्वों की तरह इस पर्व को किसी प्रमाणिक कथा की जरूरत नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्कयता नही होती है। भगवान भास्कर एवं बरुण देवता की पूजा इसमें पूर्णतया इनके सानिद्य में बिलकुल आमने सामने भक्त और भगवान होते हैं।

इस महापर्व के बारे में एक कहाबत बहुत पहले से प्रचलित है ‘सुक सुक राति ,दिया बाती ,तेकरचब्बे छैठ पराती। इस महापर्व में जीवन के सम्पूर्ण चक्र को प्रदर्शित कर प्रत्यक्ष रूप से पवित्र किया जाता है। इस ब्रत के माध्यम से आत्मा की अमरता और जीवन की निरन्तर जीवन की निरंतरता को बताने वाला पूर्व है। छठ छ,इन्द्रियों को सक्रीय करने वाला हठ योग है। परिव से यह ब्रत प्रारम्भ होता है। ब्रत के पूर्व संध्या पर अमावस्या के रात को प्रकाश पर्व दीपावली के रूप में मनाया जा रहा है। छठ काम ,क्रोध ,मद ,लोभ , मानं ,मात्त्सर्य यानि घृणा ये छठी दोष जिसे छोरने में कोई नुकशान नहीं होता है। इसका त्याग करते ही मानव के पांचों अपने आप पवित्र होने लगते हैं। मानव मन निर्मल होकर साकार परम पिता परमेस्वर का शाक्षात् अभिवादन कर स्वयं को धन्य बनाते हैं। छठ पूजा का महत्व एवं इतिहास history and importance-of-chatha-puja

You may also like...

Leave a Reply