केदारनाथ चार धाम का इतिहास history-kedarnath-chardham-yatra

kedarnath_temple_chaar_dhaamकेदारनाथ की कथा प्राचीन काल से चली आ रही है। हिमालय शिव को सदा ही प्रिय रहा है। जिस प्रकार से केदार की घाटी अपनी मनोरम छटा बिखेरती है ठीक उसी प्रकार से यह यह केदार नाथ महादेव मंदिर अपनी महामजबूती का एक अनोखा मिसाल प्रस्तुत करती हुई प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है। 400 साल तक बर्फ से ढके रहने के बाद भी इस विशाल मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा। देव भूमि उत्तराखंड का यह केदार खंड क्षेत्र अपने अंदर कई आख्यानों को समेटे हुए आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।

ये कब बना? कैसे बना? किसने बनाया? इसमें कुछ मतभेदों को भुला दें तो यहाँ की महत्ता द्वापर काल से ही चली आ रही है। इसी घाटी में परमपिता परमात्मा शिव को पांडवों ने पहचान लिया था। दरअसल इस महादेव मंदिर की तरह इसकी कथा भी आपको आश्चर्य चकित करने वाली है। कुल मिलकर यहां की कथा ,इतिहास ,आध्यात्मिक ,भौगोलिक एवं भौतिक विश्लेषण करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि यहां की सब कुछ अनोखी है। आईये यहाँ की प्राकृतिक ,ऐतिहसिक एवं बैज्ञानिक -विश्लेषण से पहले इनकी पौराणिक कथा पर नजर डालते हैं। ।

इस मंदिर की कहानी कहने से पहले आपको केदारनाथ की कथा कहते हैं। कहते हैं – महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव भगवान कृष्ण से युद्ध में हुए पाप के निवारण का उपाय बताने को कहा तब उन्होंने कहा ‘हे वीर प्रतापी पांडव आपके द्वारा किये गए अक्षम पापों को सिर्फ भोलेनाथ महादेव ही मिटाने में शक्षम हैं अतः आप लोगों को इससे मुक्ति हेतु शिव जी के पास जाना बहुत जरूरी है’बासुदेव कृष्ण की आज्ञा से पाँचों भाई भोले बाबा की खोज में चल पड़े।

जब शंकर भगवान को इसकी जानकारी हुई तो वे काशी से निकलकर हिमालय की इन बादियों में आ गए ,जिन्हें केदार क्षेत्र या केदारखंड कहते हैं। यहाँ भी जब पांडव भोले को ढूंढते हुए पहुँच गए। तो अपनी पहचान छुपाने के लिए भोलेबाबा ने वहां चर रहे भैसों के बीच में भैंषा बनकर चड़ने लगे। इतने पर भी भक्त पांडवों की नजर से शंकर जी नहीं बच पाये। शिव जी उनसे बच निकलने के लिए पहाड़ों के अंदर तेजी से घुसने लगे ,तब महाबलशाली भीम ने उनके पृष्ठ भाग को अपने विशाल भुजाओं में जकड़ लिया और पांडव त्राहि -त्राहि करके भोले नाथ की स्तुति करने लगे।

कहा जाता है की उनका शिर पशुपतिनाथ नेपाल में निकला ,मुख रुद्रनाथ में ,भुजाएं तुंगनाथ में ,नाभि मदमहेश्वर में और जटा कल्पेस्वर में निकला। ऐसा माना जाता है की यहाँ पर पांडवों ने एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया जो की कालांतर में जीर्ण हो गए। जिसे बाद में आदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया ,जिसका जीर्णोद्धार बाद में राजा भोज ने करवाया।

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