माँ कामयख्या देवी मंदिर का इतिहास history-of-maa-kamaykya devi temple

kamakhya-devi-images-HD51 शक्तिपीठों में प्रमुख स्थान रखने वाली माँ कामयख्या देवी का मंदिर बेहद खूबसूरत और अपनी एक अलग संस्कृति को लिए हुए भारत वर्ष के पर्वोत्तर में स्थित है।
इस मंदिर की महत्वता की कथाये प्राचीन काल से प्रचलित है। लोगों का मानना है की इस मंदिर में जो मनोकामनाए मांगो वह अवश्य ही पूरी होती है। उससे भी अधिक नविवाहित जोड़े का यहाँ आकर दर्शन करना यहाँ के लोगों का रिवाज है। यह कह सकते है की शुभ रसम माना जाता है।

शक्तिपीठों में मशहूर होने के अलावा यह मंदिर और इससे जुड़े भिवदरता अपने में एक बहुत ही रोचक दास्ताँ समेटे है।
पौराणिक कथाओ के अनुसार जिस समय महादेव ने असुरो को अमर होने का वरदान दिया था, उस वक़्त देवताओ में हलचल मच गयी की अगर असूर अमर हो गए तो देवताओ का क्या होगा।
इस समस्या का समाधान निकालने के लिए सभी देव ब्रह्मा जी और विष्णु जी के पास गए , अततः हल यह निकला की राजा दक्ष महायज्ञ करेंगे तो ही इसका परित्राण होगा। ब्रह्मा विष्णु की आज्ञा से।

राजा दक्ष ने यज्ञ की धूम धाम से तैयारी शुरू कर दी सभी राजाओ, देवताओ, साधुओ संतो और महादेव को निमंत्रण दिया गया, जब माता सति को इस यज्ञ का ज्ञात हुआ तो वह बहुत क्रोधित हुई और उन्हें बहुत हे शर्मिंदगी महसूस की उनके पिता राजा दक्ष ने सभी को निमंत्रण भेजा परन्तु उनके पति को नहीं वह महादेव के मना करने के बावजूद यज्ञ स्थल पर जाकर अपने पिता दक्ष प्रजा पति से अपने पति को न बुलाने का कारण पूछा तो पिता द्वारा अपशब्द कहे जाने से क्रोध में आकर यज्ञ स्थल पर गई और यज्ञ कुण्ड में अपने पिता द्वारा प्राप्त देह त्याग दिया।

महादेव को जब यह पता चली तो वह क्रोधित हुए और वहीँ तांडव करने लगे। महादेव के तांडव से पूरे ब्राह्मण में उथल पुथल मच गयी , और यज्ञ स्थल पर जाकर महादेव ने माता सती के देह को अपने काँधे पर रखा और (पागल) बावरे की तरह ब्रह्मा के चक्कर काटने लगे।

इधर ब्रह्मा और विष्णु जी ने एक योजना द्वारा अपने चक्र द्वारा माता सती के देह को खंडित कर दिया और माता के शक्तिपीठ मंदिर का निर्माण हुआ।
इसी प्रकार कामयख्या में माता की पीठ (योनि) गिरी थी। जिसका पौराणिक नाम देवी पीठ भी है।
यहाँ यह भी कहा जाता है की जिन दम्पति जोड़ो को संतान सुक प्राप्त नहीं होता वह शुद्ध मन से पूजा करे तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।
अंबुवासी के वक़्त (कामयख्या) देवी पीठ के द्वार २ दिन अपने आप बंद हो जाते है और तीसरे दिन वह अपने आप खुल जाता है।, कहा जाता है की उस समय माँ की मासिक क्रिया शुरू हो जाती है। जिसके कारण ब्रह्मपुत्र नदी का पानी भी लाल हो जाता है।

इस समय कामयख्या में अंबुवासी का मेला भी लगता है और इसमें देश विदेश से हजारो श्रद्धालु यहाँ आते है।
कामयख्या का नाम देवी पीठ से कामयख्या क्यों पड़ा ?
कहा जाता है की माँ काम्य रूपी थी अर्थार्थ अतुलनीय रूप की देवी।
कहा जाता है की माता का रूप देख कर महिसासुर माँ से विवाह करने के लिए माँ की आराधना(तपस्या) करने लगा अततः माँ को उसकी आराधना देख कर उसके पास जाना पड़ा और माँ ने महिसासुर को कहा की
माँ:- मैं तेरी आराधना से प्रसन्न हूँ जो तू चाहता है वो ही होगा। परन्तु तुझे एक रात में मेरे भक्तो के लिए पहाड़ पर मेरे दर्शन हेतु तुझे सीढ़ियों का निर्माण करना पड़ेगा।
महिसासुर:- (प्रसन्न) जैसी आपकी आज्ञा
माँ :- याद रहे एक रात यानी मुर्गे की बांग से पहले यह कार्य समाप्त होना अनिवार्य है।

एंकर:- महिसासुर ने समय व्यर्थ न करते हुए सीढ़ीओ का निर्माण करवाना प्रारम्भ किया। देखते ही देखते उसका कार्य अंतिम छोर पर आने वाला था , यह देख माता चिंतित हो गयी और उन्होंने मुर्गी का रूप धारण कर बांग दे दी, जिसे सुनकर महिसासुर क्रोध में आ गया और माँ के साथ जबरदस्ती करने लगा।
माँ क्रोधित हो गयी और अपना शेरावाली रूप धारण कर महिसासुर के पीछे दौड़ पड़ी। महिसासुर भागकर अपने ऊपर देवी पीठ पर पहुंच कर उसका वध कर दिया। इसलिए इसका नाम कामयख्या पड़ा और जहाँ माँ ने अपना शेरावाली रूप धारण किया था वहां भी एक मंदिर का निर्माण हुआ जो बाघेश्वरी नाम से प्रचलित है।

कामयख्या देवी शक्ति पीठ जाने के लिए देश के सभी प्रमुख शहरों से सीधे रेलगाड़ी से गुहाटी रेलवे स्टेशन उतर कर ऑटो या टैक्सी लेकर मंदिर तक पहुँच सकते है। हवाई मार्ग से जाने के लिए निकटम एयरपोर्ट गुहाटी है। यहाँ एयरपोर्ट से टैक्सी लेकर मंदिर तक जा सकते है। यहाँ ठहरने के लिए धर्मशाला, गेस्ट हाउस सहित छोटे बड़े होटल उपलब्ध है आप अपनी सुविधाओ के अनुसार ठहर सकते है। माँ कामयख्या देवी मंदिर का इतिहास history-of-maa-kamaykya devi temple

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