महाशिवरात्रि का इतिहास history-and-satory-of-mahasivaratri

महाशिवरात्रि पर्व की कथा क्या है इस सम्बन्ध में धर्म ग्रन्थ एवं इतिहास क्या कहता है इसका क्या महत्व है इसे मानाने का क्या विधि है और कैसे मनाया जाता है आज हम आपको महाशिवरात्रि के सम्बन्ध में विस्तार पूर्वक बताने जा रहे हैं.

भारत वर्षः को धार्मिक त्यवहारों का देश कहा जाता है यह हम सभी जानते हैं. यह मनाये जाने वाले पर्व ज्यादातर हमारी भक्ति और ईश्वर की स्तुति को दर्शाता हैं. महाशिवरात्रि का त्यवहार सनातन धर्म का सबसे प्रमुख त्यवहार है. भगवान शिव और माँ पार्वती के विवाह उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला ये त्यौहार हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है. तो आईये आज  हम महांशिवरात्रि  की कथा के सम्बन्ध में विस्तार पूर्वक जाने और श्रवण करे.

महाशिवरात्री कथा : सनातन धर्म के ग्रंथो एवं पुराणो के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष  चतुर्दशी को शिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि सृष्टि के आरम्भ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शिव, ब्रह्मा विष्णु के समक्ष  रुद्र के रूप में प्रकट हुए थे. प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के वक्त  भगवान शिव नटराज रूप में तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं. इसलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा जाता है.

त्रिलोक  की अपार सुंदरी तथा शीलवती माँ गौरा को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव भुत, प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं. भगवन शिव को देवों का देव महादेव कालों का कल महाकाल कहा जाता है उनके रूप का वर्णन इसप्रकार किया गया है। उनके शरीर पर समसान की भस्म, गले में सर्पों का माल, कंठ में विष, जटाओं में पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला एवं चन्द्रमा सुशोभित है.

शिव को एक ओर जहां प्रलय का कारक माना जाता है, वहीं शिव को बम भोला भी कहा जाता है. कहते हैं की मात्र बेल पत्र  और भांग के प्रसाद से प्रसन्न होने वाले भगवान शंकर की आज के दिन पूजा आराधना करने का विशेष महत्व और विधान है.

एक अन्य प्राचीन कथा के अनुसार आज के दिन ही शिव और माँ पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था. सुर नर, मुनि और असुरों के साथ बारात लेकर भगवान शिव माता पार्वती से विवाह रचाने  के  लिए गए थे. भगवान शिव की नजर में अच्छे बुरे दोनों ही तरह के लोगों का बराबर स्थान है. अर्थात वह उनसे भी प्रेम करते हैं जिन्हें यह समाज ठुकरा देता है.

शिवरात्रि को भगवान शिव पर जो बेल और भांग दोनों का चढ़ाया जाना शिव की एक सामान भावना को प्रदर्शित करती है. अर्थात जो मुझे समर्पित हो, मैं उसका हो जाता हूं।

शिव की महिमा: शिव को सबसे जल्द क्रोधी होने के साथ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले भी माना जाता हैं. इसीलिए युवतियां अपने अच्छे वर की कामना के लिए शिवजी का सोलह सोमवार तक व्रत  रखती हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार शिव जी की चाह में माता पार्वती ने भी शिव का ही ध्यान रखकर व्रत  किया था और इसी के फल स्वरूप उन्हें शिव वर के रुप में प्राप्त हुए थे. इसी के आधार पर आज भी स्त्रियां अच्छे वर की चाह में शिव का व्रत रखती है और कहते हैं की  शिवरात्रि को तो व्रत रखने का महत्व कई गुना बढ़ जाता है.

पूजन सामग्रीः सुगंधित पुष्प, बिल्वपत्र, धतूरा, भाँग, बेर, आम्र मंजरी, जौ की बालें,तुलसी दल, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, ईख का रस, दही, शुद्ध देशी घी, शहद, गंगा जल, पवित्र जल, कपूर, धूप, दीप, रूई, मलयागिरी, चंदन, पंच फल पंच मेवा, पंच रस, इत्र, गंध रोली, मौली जनेऊ, पंच मिष्ठान्न, शिव व माँ पार्वती की श्रृंगार की सामग्री, वस्त्राभूषण रत्न, सोना, चाँदी, पूजा के बर्तन, कुशासन आदि या यथा सामर्थ जो उपलब्ध हो सके।

व्रत एवं पूजा विधि – शिव की आराधना करने वाले महाशिवरात्रि के प्रातः काल उठकर स्नान ध्यान कर निवृत्त होने पर मस्तक पर भस्म का तिलक और गले में रुद्राक्ष का माला धारण कर शिवालय में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं भगवन शिव को नमस्कार करना चाहिए। तत्पश्चात उसे श्रद्धापूर्वक व्रत का संकल्प करना चाहिए-

हाथ में पुष्पाक्षत्‌ जल आदि लेकर ये मंत्र पढ़ें ;

शिवरात्रिव्रतं ह्येतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम।

निर्विघ्नमस्तु से चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।

उक्त मंत्र का उच्चारण करके हाथ से पुष्पाक्षत्‌ जल आदि को छोड़ने के पश्चात यह श्लोक पढ़ना चाहिए-

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु से

कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।

तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।

कामाशः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि॥

अर्थात: हे देव ! हे महादेव ! हे नीलकण्ठ ! आपको नमस्कार है। हे देव ! मैं आपका शिवरात्रि व्रत करना चाहता हूं। हे देवश्वर ! आपकी कृपा से यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण् हो और काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु मुझे पीड़ित न करें मुझ पर ऐसी कृपा कीजिये, शक्ति दिजिये।

इसतरह आप व्रत शुरू करे .

दिनभर शिवमंत्र ॐ नमः शिवाय का यथाशक्ति जप करना चाहिए ।

रुग्ण, अशक्त और वृद्ध व्यक्ति  दिन में फलाहार ग्रहण कर रात्रि पूजा कर सकते हैं, वैसे यथाशक्ति बिना फलाहार किये रात्रिपूजा करना उत्तम माना गया  है।

रात को जागरण करना चाहिए।

रात्रि के चारों प्रहरों में पूजा का विधान शास्त्रों ने किया है। सायंकाल स्नान करके शिवमंदिर जाये अथवा घर पर ही सुविधानुसार पूर्वाभिमुख (पूर्व मुख) या उत्तराभिमुख ( उत्तर मुख ) होकर और तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का संकल्प करे- देशकाल का संकीर्तन करने के अनंतर बोले- ‘ममाखिलपापक्षयपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थ च शिवपूजनमहं करिष्ये।’ किसी वैदिक विद्वान के निर्देश में वैदिक मंत्रों से रुद्राभिषेक का अनुष्ठान करवाएं अति उत्तम अन्यथा आप स्वम भी कर सकते हैं।

इस प्रकार पूजन कर भगवन शिव के कृपा पत्र बने। प्रेम से बोलिए ओम नमः शिवायः

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