15 जून 2017 को है राजा पर्व,जानिए व्रत की कथा एवं इतिहास

devotional raja parv history





वेदों, पुराणों एवं शास्त्रानुसार एक वर्ष में 12 संक्रांति होती है। जिसमें सूर्य अलग राशि और नक्षत्र में विराजमान होते है। इस वर्ष गुरुवार 15 जून 2017 को मिथुना संक्रांति मनाई जाएगी। वर्ष के सभी संक्रांति में दान-पुण्य का अति विशेष महत्व है। ये संक्रांति राशिफल के नाम पर आधारित है। इन संक्रांति में मिथुना संक्रांति भी एक है। devotional raja parv history 

मिथुन संक्रांति के आगमन से सौर मंडल में विशेष बदलाव आता है तात्पर्य मिथुना संक्रांति के आगमन पर वर्षा ऋतू का भी आगमन होता है। इस तिथि को सूर्य देव वृषभ राशि से निकलकर मिथुना राशि में प्रवेश करते है जिस कारण सभी नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है। हिन्दू धर्म कांड के अनुसार नक्षत्र और राशि में बदलाव का विशेष महत्व है। अतः इस दिन विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना की जाती है। हालांकि, देश के विभिन्न हिस्सों में मिथुना संक्रांति अलग-अलग तरीके से मनाई जाता है। जबकि देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसे भिन्न-भिन्न नाम से भी पुकारा जाता है। devotional raja parv history 

पूर्व में आषाढ़

दक्षिण में संक्रमानम

ओडिसा में राजा पर्व

केरल में मिथुनम ओठ

राजा पर्व का महत्व

ओडिसा में इसे राजा पर्व कहा जाता है। यह पर्व 4 दिनों तक चलता है और बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व पर पहली बारिश का स्वागत किया जाता है। ओडिसा में अच्छी फसल की उपज और अच्छी मानसून के लिए इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जिसमें लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते है। devotional raja parv history 

कब मनाई जाती है

मिथुना संक्रांति जून माह में 14-15 जून को मनाई जाती है। चार दिन तक चलने वाले इस पर्व के पहले दिन को पहिली राजा, दूसरे दिन को मिथुना संक्रांति, तीसरे दिन को भू दाहा और चौथे दिन को वसुमती स्नान कहते है। devotional raja parv history




राजा पर्व और मिथुना संक्रांति कथा

प्रकृति के नियम अनुसार स्त्री को हर महीने मासिक धर्म होता है जो उनके शरीर विकास का प्रतीक है। ठीक उसी प्रकार राजा पर्व में ऐसी मान्यता है कि धरती माँ को पहले तीन दिन मासिक धर्म हुआ, अतः इस पर्व में पहले तीन  दिन का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता अनुसार इससे धरती का विकास होता है। चौथे दिन भू अर्थात धरती माँ को स्नान कराया जाता है। अतः इस दिन को वसुमती गढ़ुआ कहते है। धरती माँ के रूप के बारे में बताया गया है कि उनका रूप पीसने वाला सील बट्टा है। राजा पर्व पर धरती माँ की पूजा की जाती है ताकि फसल की पैदावर अच्छी हो, भगवान विष्णु के रूप जगन्नाथ की पत्नी भूदेवी की चांदी की प्रतिमा आज भी ओडिसा के जगनाथ मंदिर में विराजमान है। devotional raja parv history 

मिथुना संक्रांति में सूर्य देव की पूजा की जाती है ताकि आने वाले जीवन में शांति और मंगल का आगमन हो। चार दिन के इस पर्व में पहले दिन को सजबजा कहते है। इस दिन घर की औरतें आने वाले चार दिनों के पर्व की पूरी तयारी करते है। औरते अपने घर की साफ़ सफाई करती है, सील बट्टे को अच्छी तरह से धोकर साफ़ किया जाता है। क्योंकि आने वाले चार दिनों तक सील बट्टे का घरेलु उपयोग करना वर्जित रहता है। devotional raja parv history 

मिथुना संक्रांति के चार दिन के इस पर्व में औरतें पहले तीन दिन तक खूब मौज मस्ती करती है। जिसमें नृत्य, गायन, खेल आदि शामिल है।  बगीचे के पेड़ों में झूले लगाये जाते है। औरतें इस झूले में झूलती हुई गीत गाती है। इस पर्व में विवाहित औरतों के साथ-साथ अविवाहित लड़कियां भी शामिल होती है। ये औरतें पुरे परिधान में सज धजकर आती है। मेहंदी लगाती है, नई चूड़ियां पहनती है। विवाहित औरते अपने सुहाग और संतान की सुख, सुरक्षा के लिए व्रत करती है तो अविवाहित लड़कियां मनचाहा वर प्राप्ति के लिए ये व्रत करती है।  devotional raja parv history 

मान्यता है जैसे धरती अच्छी फसल के लिए खुद को तैयार करती है। ठीक उसी तरह अविवाहित लड़कियां भी खुद को तैयार करने और सुखमय जीवन जीने के लिए प्रार्थना करती है।

मिथुना संक्रांति के पहले दिन तक औरतें उपवास रखती है। इस उपवास के दौरान वे पका हुआ खाना नहीं खाती है, नमक नहीं खाती है, चप्पल भी नहीं पहनती है। पर्व के तीनों दिन तक औरतें न कुछ छील सकती है न कुछ खुदाई कर सकती है। पहले दिन औरतें ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, हल्दी चन्दन का लेप लगाकर, सर धोकर नहाती है। बाकी के दो दिन औरतें नहीं नहाती है। devotional raja parv history 

चौथे दिन का पूजा इस प्रकार की जाती है।

सील बट्टे में हल्दी चन्दन पीसकर लेप बनाती है जिसे सुबह उठकर सभी औरते लगाकर नहाती है। सील बट्टे को भू देवी माना जाता है। अतः सील बट्टे को दूध और पानी से स्नान कराया जाता है। सील बट्टे अर्थात भू देवी को चन्दन, हल्दी व फूल से सजाया जाता है। इनकी पूजा करने के पश्चात वस्त्र दान का विशेष महत्व है। भू देवी को सभी मौसमी फलो का चढ़ावा चढ़ाया जाता है व उस फल को गरीबों में बाँट दिया जाता है। अन्य संक्रांति की भांति इस दिन भी दान-पुण्य किया जाता है। इस दिन पोडा-पीठा नाम की मिठाई बनाई जाती है जो गुड़, नारियल, चावल के आटे और घी के मिश्रण से बनता है। मिथुना संक्रांति के दिन चावल के दाने खाना निषेध है।  devotional raja parv history   

मिथुन संक्रांति के दिन ओडिसा के जगनाथ मंदिर में भव्य पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर को विशेष प्रकार से सजाया जाता है। देश-विदेश से दर्शनार्थी मंदिर पहुंचते है। इस पर्व पर किसी भी प्रकार की कृषि कार्य नहीं किया जाता है। जिस प्रकार औरते के मासिक धर्म होने पर किसी भी प्रकार का काम नहीं करने दिया जाता है। उसी प्रकार पर्व के दौरान कृषि का कोई कार्य नहीं किया जाता है। devotional raja parv history 

कुर्मा जयंती की कथा एवं इतिहास

इस त्यौहार पर पुरष अपने को व्यस्त रखने के लिए विभिन्न प्रकार के खेल खेलते है। जिसमें कबड्डी का भव्य आयोजन किया जाता है। रात्रि में नाच गान का आयोजन होता है। शहर में भाग दौड़ भरी जिंदगी में ये त्यौहार कम मनाया जाता है। लेकिन गांव में पर्व को लेकर अति उत्साह रहता है। इस पर्व को औरते सच्ची श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा से करती है क्योंकि पर्व के दौरान उन्हें काम काज से छुट्टी मिल जाती है। यह पर्व माँ धरती को समर्पित है अतः इस दिन सभी माँ धरती को धन्यवाद देते है। इस प्रकार मिथुना संक्रांति और राजा पर्व की कथा सम्पन्न हुई। devotional raja parv history 

( प्रवीण कुमार )

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