लव कुश वाल्मीकि आश्रम का इतिहास history-of-lave-kusha-valmiki-asrama

luv-kush-mandir-ka-itihasबाल्मीकि नगर जो वर्तमान में बिहार प्रान्त के अंतर्गत राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को छूती एकदूसरे से गले मिलते बिहार, नेपाल और उत्तर प्रदेश केबीच बाल्मीकि नगर का यह स्थान महर्षिबाल्मीकि स्थान के नाम से जाना जाता है।
बन और नदियाँ यहां की शोभा में चार में चाँद लगाती है। प्राचीन मिथिला की पश्चमी सीमा पश्चिमी चंपारण में पड़नेवाला यह पावन तीर्थ स्थल है। त्रेता काल से लेकर आज तक यहाँ की महिमा का गुणगान हम अपने धर्म शाश्त्रों के माध्यम से सुनते और पढ़ते चले आ रहे हैं। यही पर माता जानकी बणदेवी बनकर महर्षि बाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश को जन्म दिया। यही अस्वमेघ का घोड़ा लव और कुश ने पकड़ा था जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने छोड़ा था। यही माता सीता धरती में समाई थी।

यही वह पवित्र भूमि है जहाँ आल्हा और उदल की कुलदेवी माता नरदेवी का प्राचीन मंदिर यहाँ विद्यमान है। प्रकृर्ति के प्रांगण में बसा यह स्थान अपनी कहानी अपने आप कहती प्रतीत होती है। वास्तव में यहीं त्रिवेणी संगम है।

स्वर्ण भद्रा ,ताम्रभाद्र और नारायणी जैसी प्राचीन देव नदियां का संगम इसी स्थान पर है। आज स्वर्ण भद्रा को सरश्वती ,ताम्रभद्रा को तमसा कहाजाता है। सदानीरा नारायणी से मिलकर ये दोनों नदियां त्रिवेणी संगम बनती हैं। यहाँ सेआगे बिहार में बहने वाली एक प्रसिद्ध नदी निकलती है जिसे गंडक नदी के नाम से जाना जाता है।

वैसे गज और ग्राह की प्रिसिद्ध लड़ाई भी इसी क्षेेत्र से शुरू हुई थी। आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण जैसी महान कृति की रचना इसी आश्रम में की थी। खुदाई में यहाँ से निकली कई भव्य मूर्तियां इस स्थान की प्रमाणिकता प्रदर्शित करती नजर आती है।
यहाँ की सबसे अधिक पूजनीय एवं प्रसिद्ध सीता माता का समाधी स्थल। कहा जाता है अंत समय में जब सीता ने धरती माता से अपने गोद में लेने के लिए प्रार्थना की। धरती माता प्रकट होकर सीता को लेकर देखते ही देखते जमीन के भीतर लेकर चली गई।
यहाँ का चन्देस्वर महादेव मंदिर यहाँ आने वालों केलिए श्रद्धा और आस्था का केंद्र बना हुआ है। प्राचीन काल से आराधित इस शिवालय में अंकुरित महादेव हैं। इस जगह महात्मा गांधी एवं आजादी के बाद प्रथम प्रधान मंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू भी आए। कहा जाता है की स्वप्न देखने के बाद जब खुदाई की गई तो उसमें से यह शिव लिंग निकला। जनश्रुति के अनुसार आदि कवि बाल्मीकि के द्वारा यह शिव लिंग सेवित था ,जो कालांतर में जमींदोज हो गया था। लव कुश वाल्मीकि आश्रम का इतिहास history-of-lave-kusha-valmiki-asrama

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