12 फरवरी 2018 को स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती है जानिए इनकी जीवनी

know dayananda sarswati life history




महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जन्म 12 फरवरी 1824 आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जन्म 12 फरवरी 1824 ई को गुजरात राज्य के राजकोट शहर स्थित रियासत मोरवी के टंकारा नामक गाँव में एक ब्राह्मण परिवार के घर हुआ था। इनके पिता का नाम कृष्णा लालजी तिवारी तथा उनकी माता का नाम यशोदाबाई था। दयानंद जी का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था, अतः इनके पिता जी और पुरोहितो ने इनका नाम मूलशंकर रखा। मूलशंकर बाल्यकाल से प्रखर बुद्धि के ज्ञाता थे। अधाय्त्म में इनकी रूचि इन्हे विरासत से मिली थी।  इस वर्ष शनिवार 12 फरवरी 2018 को स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती मनाई जाएगी। know dayananda sarswati life history

मूलशंकर जी ने मात्र 14 वर्ष की आयु में यजुर्वेद के साथ-साथ रूद्र मंत्रों के श्लोको को कंठस्थ कर लिया था एवम व्याकरण के विषय में भी प्रखर पंडित की उपाधि प्राप्त कर ली थी। मूलशंकर के पिता जी कृष्णा तिवारी  भगवान शिव जी के भक्त थे और मूलशंकर भी अपने पिता द्वारा दिए गए निर्देशो का पालन करते हुए शिव भक्त बन गए। मूलशंकर की बुद्धिमता का परिचय उनके वार्तालाप के जरिये लोगों के समक्ष प्रस्तुत होता था। लोग उनके तार्किक और आध्यात्मिक बुद्धि से हतप्रभ हो जाते थे।

एक बार उनके पिता कृष्णा जी तिवारी ने कहा की बेटा मूलशंकर आज महाशिवरात्रि है और मेरी ये अभिलाषा है की तुम भी शिव जी की भक्ति एवम व्रत का उपवास करों। मूलशंकर जी ने पिता के आदेशो का पालन किया किन्तु मंदिर में पूजा करते समय मूलशंकर जी ने एक चूहा को शिव जी की मूर्ति पर अनवरत इधर-उधर भटकते देखा जिसे देख मूलशंकर जी के मन में संशय पैदा हो गया की भगवान खुद अपने प्रतिमूर्ति की रक्षा नही कर पाते है तो समस्त विश्व की रक्षा कैसे करेंगे। इस संशय के पश्चात मूलशंकर जी को भगवान से विरक्ति हो गयी तदोपरांत मूलशंकर जी ने पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यो का परित्याग कर दिया तथा भगवान ब्रह्म की खोज में घर से निकल पड़े। know dayananda sarswati life history




स्वामी विरजानन्द के शिष्य know dayananda sarswati life history

मूलशंकर सत्य और ज्ञान की खोज में इधर-उधर भटकने लगे। भटकते-भटकते एक दिन मथुरा में वेदो के प्रख्यात पंडित स्वामी विरजानंद जी के पास पहुंचे। उन्होंने मूलशंकर को अपने शिष्य के रूप में स्वीकारा और मूलशंकर को वेद का ज्ञान-दीक्षा दिया। तदोपरांत स्वामी विरजानंद जी ने मूलशंकर को इन शब्दों के साथ विदा किया, संसार में जाके, मनुष्यों में ज्ञान की ज्योति को प्रकशित करो । गुरु के आदेशो का पालन करते हुए मूलशंकर अर्थात महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी देश भर्मण को निकल पड़े। know dayananda sarswati life history

‘हरिद्वार में महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती

गुरु विरजानंद जी के आज्ञानुसार महर्षि दयानंद जी ने अपना शेष जीवन को मानवता के उत्थान हेतु  समर्पित कर दिया।  सर्व प्रथम  हरिद्वार में उन्होंने मूर्ति-पूजा का विरोध किया और ‘पाखण्डखण्डिनी पताका’ को फहराया। उनका मत था की यदि सर मुंडवाने, गंगा नहाने और भभूत लगाने से स्वर्ग या भगवान की प्राप्ति होती है तो सर्वप्रथम यह अधिकार जानवरों को प्राप्त होगा।

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उन्होंने कहा की सर्वप्रथम तो हम अपने परिजन श्रेष्ठ के ह्रदय को प्रताड़ित करते है और उनके मृत्यु के पश्चात श्राद्ध कर्म और पिंड तर्पण करते है क्या ये सब धर्म हमें सिखाता है ? महर्षि जी ने भेदभाव का भी कड़े शब्दों में विरोध किया उन्होंने कहा कि हम धर्म को बाँट देते है जबकि भगवान सबके लिए एक समान है। महर्षि जी ने महिलाओं और समाज के पिछड़े वर्गो को भी अपनाया। महर्षि जी ने 1863 से 1875 तक सम्पूर्ण भारत का भर्मण किया और भर्मण के दौरान 1875 ई में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की। उनके अनुयायी की संख्या देश में बढ़ती गयी और देखते ही देखते समस्त भारत में आर्य समाज के अनेकों शाखाएं खोली गयी।

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी की रचनाएँ know dayananda sarswati life history

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में विशेष योगदान दिया। हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के दौरान उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की, इन्होनें पाखंड खंडन की रचना 1866 में किया, सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक की रचना सन 1874 में किया, वेद भाष्य भूमिका पुस्तक की रचना सन 1876 में किया, ऋग्वेद भाष्य पुस्तक की रचना सन 1877 में किया, पंचमहायज्ञ विधि पुस्तक की रचना सन 1875 में किया, तथा वल्लभाचार्य मत का खण्डन पुस्तक की रचना सन 1875 में किया। know dayananda sarswati life history
महर्षि का  निधन
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी की मृत्यु एक दुखद और रहस्मय तरीके से हुई जब उन्हें दूध में जहर मिलाकर पिला दिया गया जिससे उनकी रहस्मय रूप से मौत हो गयी। इस रहस्मय षड्यंत्र के कारण महर्षि स्वामी जी के शरीर को निर्वाण प्राप्त हुआ । महर्षि स्वामी दयानद सरस्वती की मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 ई को हो गयी। आर्य समाज एक ऐसा आंदोलन था जिसने भारत के समस्त वर्गो को जोड़ा और मूर्ति पूजा तथा बाह्य आडम्बर से व्यक्ति विशेष को दूर रखा। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती एक ज्योति के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत हुए और हमारे जीवन में एक प्रकाश प्रदान कर गए जो आने वाली पीढ़ी के लिए भी मार्ग प्रशस्त करेगी। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी को शत-शत नमन। know dayananda sarswati life history
( प्रवीण कुमार )

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