जानिए देश के प्रथम शहीद खुदीराम बोस जी की जीवनी




आजादी से पूर्व और पश्चात देश में कई ऐसे शूरवीर पैदा हुए, जिन्होंने अपने पराक्रम और साहस का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया। जिसमें भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभास चंद्र बोस जैसे अनेकों वीर थे। इन वीरों में एक बहादुर वीर खुदीराम बोस थे। जो देश की आजादी के लिए महज 19 वर्ष में सूली पर चढ़ गए। हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि खुदीराम से पूर्व 17 जनवरी 1872 को 68 कूकाओं के सार्वजनिक नरसंहार के समय 13 वर्ष का एक बालक भी शहीद हुआ था। वैसे आज पूरा देश आजादी के 70 साल बाद भी उन सभी शहीदों को शत शत नमन करता है। khudiram bose life story

उनका जरा भी मन नहीं लगता था।

आज मैं आपको खुदीराम बोस जी के जीवन के बारे में बताने जा रहा हूँ। खुदीराम बोस का  जन्म पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में 3 दिसंबर 1889 को हुआ था। इनके पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। खुदीराम बोस बचपन से ही देशभक्त थे इसलिए पढाई में उनका जरा भी मन नहीं लगता था। ऐसे में किसी तरह बोस ने नौंवी तक पढाई की और फिर पढाई छोड़ स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। इनके देश प्रेम के प्रति उत्साह और लग्न देखते बनती थी। ब्रिटिश सम्राज्य को ध्वस्त करने के लिए बोस ने छात्र जीवन में ही पहला बम अंग्रेजों पर फेंका और महज 19 वर्ष की में हाथ में भगवद गीता लिए हँसते हँसते फांसी के  फंदे पर चढ़ गए।

बोस ने स्कूल छोड़ने के बाद रिवोल्यूशनरी पार्टी ज्वाइन की और वन्दे मातरम नारे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बंगाल में वन्दे मातरम् का पैम्पलेट वितिरत किया। इसके साथ बोस ने 1905 में बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में चलाए गए आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

बोस क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ द्वारा लिखे ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पत्रक के पैम्पलेट फरवरी 1906 में बंगाल के मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी में बाँट रहे थे उसी वक्त एक पुलिस कर्मी ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की। जिस पर बोस सिपाही के मुंह पर घूंसा मार फरार हो गए। इस मामले में बोस के खिलाफ अभियोग चलाया गया लेकिन गवाह न मिलने के कारण बोस निर्दोष रिहा हो गए।

इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार खुदीराम बोस 28 फरवरी 1906 को गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन वो कैद से भाग निकले। इसके दो महीने पश्चात अप्रैल महीने में फिर से पकड़े गए लेकिन 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया। khudiram bose life story

वही 6 दिसंबर 1907 को बोस ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया। इस हमले में गवर्नर बाल बल बच गया। इसके बाद 1908 में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले।




पुराने से पुराने Acne कील मुंहासे का इम्पेक्ट ट्रीटमेंट कीट

30 अप्रैल 1908 को दोनों पूर्व से निर्धारित काम के लिए निकले और किंग्जफोर्ड के बँगले के बाहर घोडागाडी से उसके आने की राह देखने लगे। वहां बंगले के चौकीदार ने उन्हें हटाना चाहा लेकिन वे दोनों नहीं गए, और वही रुके रहे। रात में साढे आठ बजे के आसपास किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाडी आते हुए देखकर खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे लेकिन रास्ते में बहुत अँधेरा था। जिससे बोस को कुछ दिखा नहीं और अँधेरे में ही आगे वाली बग्घी बम फेंका। बम फटने की आवाज तीन मील दूर तक गई और फिर ब्रिटेन और इंग्लैंड में सुनी गई। इस घटना से पुरे देश और ब्रिटेन में तहलका मच गया। हालांकि, बोस ने किंग्जफोर्ड की गाडी समझकर बम फेंका था लेकिन बम किसी और गाड़ी पर गिरी। इस हमले में दो यूरोपियन स्त्रियों की मौत हो गई। इस घटना के बाद दोनों रातों रात नंगे पैर भागते हुए वैनी रेलवे स्टेशन पहुंचे और वही पर विश्राम किया। khudiram bose life story

लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन के बाद लोग सड़कों पर उतर आए। जिससे ब्रिटिश हुकूमत सहम गई और सड़कों पर उतरे लोगों को कोलकाता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। किंग्जफोर्ड ने अन्य क्रांतकारियों को भी बहुत यातना और कष्ट दिया था। इसके फलस्वरूप ब्रिटिश हुकूमत ने किंग्जफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के पद पर भेज दिया। किंग्जफोर्ड को सबक सिखाने के लिए युगांतर समिति ने एक गुप्त बैठक की जिसमें किंग्जफोर्ड को मारने का निश्चय किया। इस काम के लिए युगांतर समिति ने खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार चाकी का चयन किया गया। इसके लिए खुदीरामको एक बम और पिस्तौल दी गयी। इसके बाद दोनों मुजफ्फरपुर आ गए और किंग्जफोर्ड के बँगले की निगरानी करने लगे और इसी दरम्यां उन्होंने बग्घी तथा उसके घोडे का रंग देख लिया। खुदीराम तो किंग्जफोर्ड को उसके कार्यालय में जाकर ठीक से देख भी आए।

ब्रिटिश पुलिस बोस के पीछे लगी थी और वैनी स्टेशन पर घेर लिया। अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल्लकुमार चाकी ने खुद को गोली मारकर अपनी शहादत दे दी लेकिन बोस पकड़े गए और उन पर मुकदमा चला और 11 अगस्त 1908 को बोस को मुजफ्फरपुर जेल में फाँसी दे दी गयी। उस समय बोस की उम्र लगभग 19 साल थी। देश के प्रथम शहीद खुदीराम बोस को शत शत नमन।khudiram bose life story

18 मार्च 2018 को मनाया जाएगा गुड़ी पड़वा,जानिए कथा एवम इतिहास