जानिए माँ महातारा जयंती की कथा एवम इतिहास

devotional mahatara history

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devotional mahatara history हिन्दू धर्म के अनुसार चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को महातारा जयंती मनाई जाती है। तदनुसार, वर्ष 2018 का महातारा जयंती शनिवार 24 अप्रैल 2018 को मनाई जाएगी। तांत्रिक साधको के लिए माँ तारा की उपासना सर्वसिद्धिकारक माना जाता है। माता तारा को सूर्य प्रलय की अघिष्ठात्री देवी का उग्र रुप माना जाता है। माँ तारा की उपासना करने से माँ व्रती को विपत्ति से मुक्त करती है।

माता तारा की कथा devotional mahatara history 

सृष्टि की उतपत्ति से पूर्व चारो ओर घोर अंधकार व्याप्त था ना कोई तत्व था तथा ना ही कोई शक्ति थी केवल एक अंधकार का सम्राज्य था और इस अंधकार की देवी माँ काली थी। इस अंधकार से एक प्रकाश की किरण उतपन्न हुई जो माता तारा कही गई। ब्रह्मण्ड में जितने भी पिंड है उन सबका स्वामिनी माता तारा ही मानी जाती है। माँ तारा को नील तारा भी कहा जाता है। कथानुसार, जब सागर मंथन हो रहा था तो सागर से अनेक वस्तुएं निकल रही थी परन्तु जब विष निकला तब तीनो लोक संकट में पड़ गए। devotional mahatara history 

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तदुपरांत,  देव-दानवो तथा ऋषि-मुनियो ने भगवान रूद्र से रक्षा की गुहार लगाई। भगवान रूद्र अर्थात शिव जी ने विष को पी लिया और अपने कंठ में धारण कर लिया। भगवान शिव जी का कंठ विष के कारण नीला हो गया। माता पार्वती ने भगवान शिव के अंदर समाहित होकर विष को अपने प्रभाव से हीन कर देती है परन्तु विष के प्रभाव से माता का शरीर भी नीला पड़ जाता है। इस कारण माँ नीलतारा के नाम से भी जानी जाती है। devotional mahatara history 

माता तारा का विभिन्न नाम

माँ तारा के प्रमुख तीन रूप है 1 उग्रतारा 2 एकाजटा 3 नील सरस्वती देवी।

देवी माता तारा की प्रमुख सात कलाएं है परात्परा, चित्परा, तदतीता, सर्वातीता, परा, अतीता, तत्परा है। जो देवताओं सहित समस्त जगत प्राणी की रक्षा करती है। इन्हे आदि शक्ति माना गया है। devotional mahatara history 

माँ तारा जयंती का महत्व

माँ तारा के  भक्त की बल, बुद्धि, विद्या, शक्ति का मुकाबला तीनो लोको में कोई नही कर सकता है। माँ तारा व्रती को भोग तथा मोक्ष एक साथ प्रदान करती है। अतः माँ तारा को सिद्धविद्या देवी भी कहा गया है। devotional mahatara history 

माता तारा की पूजन विधि

माँ तारा जयंती के दिन माँ की पूजा विधि-विधान से सम्पन्न करें। इस दिन प्रातः काल उठें तथा स्नान-ध्यान से पवित्र हो लें। माता की प्रतिमूर्ति को गंगा जल अथवा शुद्ध जल से स्नान कराकर उन्हें पूजा स्थल के चौकी पर स्थापित करे। तदुपरांत, उनका श्रृंगार करें । माँ  तारा की पूजा धुप, दीप, अगरबत्ती आदि से करें। शक्तिानुसार, इस दिन निराहार व्रत करें तथा रात्रि में फलाहार करें । माँ व्रती के सारे सिद्धयों को पूर्ण करती है। इस प्रकार माँ तारा की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए माता तारा की जय। devotional mahatara history 

( प्रवीण कुमार )

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