जानिए वामन द्वादशी की कथा एवम इतिहास

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सनातन धर्म के अनुसार चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन द्वादशी मनाया जाता है। तदनुासर, शुक्रवार  28 मार्च 2018 को वामन द्वादशी है। वामन अवतार को भगवान विष्णु का महत्वपूर्ण अवतार माना गया है। भगवान विष्णु जी की लीला अपरम्पार है और भगवान वामन का अवतार उसी महिमा रूपों में से एक है। devotional vaman dwadashi history 

वामन द्वादशी की कथा  devotional vaman dwadashi history 

धार्मिक कथानुासर एक बार की बात है जब राजा इंद्र को दैत्यराज बलि की इच्छा का ज्ञान होता है कि दैत्यराज बलि सौ यज्ञ पूरा करने के पश्चात स्वर्ग को प्राप्त करने में सक्षम हो जाएगा। तदोपरांत स्वर्ग के राजा इंद्र भगवान विष्णु की शरण में जाते है। देवताओं की व्यथा सुन भगवान विष्णु समस्त देवता गण को सहायता करने का आश्वासन देते है तथा उनको भविष्य में वामन रूप से अवगत कराते है। devotional vaman dwadashi history 

भगवान विष्णु जी कहते है, भविष्य में मैं माता अदिति के गर्भ से वामन रूप में अवतार लूंगा। भगवान विष्णु जी के वचनानुसार भाद्र माह में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भगवान विष्णु माता अदिति के गर्भ से अवतार लेते है तथा बाल्यकाल से ब्रह्मचारी ब्राह्मण रूप को धारण कर लेते है।

भगवान विष्णु के वामन रूप का उनके पिता महर्षि कश्यप ने उपनयन संस्कार किया। उपनयन संस्कार के पश्चात पिता से आज्ञा लेकर ब्राह्मण वामन राजा बलि के पास नर्मदा के उत्तर-तट पर पहुँचते है जहाँ दैत्यराज बलि अंतिम यज्ञ कर रहे थे। devotional vaman dwadashi history 
वामन अवतार भगवान विष्णु, राजा बलि से भिक्षा-याचना करते है। राजा बलि बाल्य वामन ब्राह्मण को देख उन्हें भिक्षा देने का आशवासन देते है। भगवान वामन उनसे तीन पग भूमि दान में देने की याचना करते है जिसे दैत्यराज बलि शंककराचार्य के विरोध करने के बाबजूद दान में देने का वचन देते है। तत्पश्चात भगवान वामन एक पग में स्वर्ग को, दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते है। अब तीसरा पग रखने का कोई स्थान नही रह जाता है। devotional vaman dwadashi history 




नवरात्रि की कथा एवम इतिहास

इस स्थिति में राजा बलि के समक्ष संकट उतपन्न हो जाता है की ब्राह्मण वामन को तीसरा पैर रखने के लिए स्थान कहाँ से लाएं। आख़िरकार अपने कर्तव्यों का पालन हेतु राजा बलि अपना मष्तक भगवान के आगे कर देते है। राजा बलि कहते है, हे ब्राह्मण देव तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।

भगवान वामन ठीक वैसा ही करते है तथा दैत्यराज बलि को पाताल लोक में रहने का आदेश देते है। परन्तु दैत्यराज बलि की दान तथा भक्ति से प्रभु प्रसन्न होते है। भगवान विष्णु राजा बलि से वर मांगने को कहते है। तत्पश्चात, राजा बलि उनसे साथ में रहने का वचन मांगते है। भगवान विष्णु अपने वचन का पालन करते हुए पाताल लोक में राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते है। devotional vaman dwadashi history 

वामन द्वादशी पूजन विधि एवम महत्व

वामन द्वादशी के दिन प्रातः काल व्रती को श्री हरि विष्णु जी का स्मरण करते हुए नियमानुसार विधि पूर्वक पूजा करना चाहिए। भगवान वामन देव की पूजा करने के पश्चात चावल, दही आदि भोज्य पदार्थ का दान करें। इस दिन संध्या के समय व्रती को भगवान वामन का पूजन करना चाहिए तथा व्रत कथा सुननी चाहिए। devotional vaman dwadashi history 

नवरात्रि की कथा एवम इतिहास

वामन द्वादशी की पूजा सम्पन्न होने के पश्चात परिवार वालो में प्रसाद वितरित करें। इस दिन व्रत करने से भगवान वामन प्रसन्न होते है तथा व्रती की समस्त मनोकामनाएँ को पूर्ण करते है। इस तरह भगवान वामन द्वादशी की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए भगवान विष्णु अवतार वामन देव की जय।  devotional vaman dwadashi history 
( प्रवीण कुमार )

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