27 जून 2018 को है वट पूर्णिमा,जानिए व्रत की कथा एवम इतिहास

 story and history of vat purnima





धार्मिक ग्रंथो के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। तदनुसार इस वर्ष गुरुवार 27 जून 2018 को वट सावित्री व्रत मनाया जायेगा। यह व्रत महिलाएं अपने सौभाग्य की कामना एवम संतान प्राप्ति के लिए करती है।  devotional vat purnima history

भारतीय संस्कृति में वट सावित्री व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना गया है। विभिन्न धार्मिक पुराणो में इस व्रत के विषय में विस्तार पूर्वक बताया गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार वट सावित्र पूर्णिमा व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। जबकि अन्य पौराणिक ग्रथो में ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वत सावित्री व्रत का उल्लेख है।




वट सावित्री व्रत कथा devotional vat purnima history 

स्कन्द पुराण के अनुसार, भद्र देश के राजा अश्वपति को कोई संतान नही थी जिस कारण राजा अश्वपति सदैव कुण्ठित रहते थे। तत्पश्चात उन्होंने अपने राज्य पुरोहित से इस संदर्भ में कोई माध्यम बताने का अनुरोध किया। राज्य पुरोहित ने कहा, हे राजन आप सावित्री देवी की पूजा करें। माँ सावित्री प्रसन्न होकर आपको मनोवांछित वर अवश्य देंगी। devotional vat purnima history 

राजा अश्वपति ने संतान प्राप्ति के लिए कई वर्षो तक तपस्या किया जिससे माँ सावित्री अति प्रसन्न हुई। माँ सावित्री ने प्रकट होकर उन्हें पुत्री का वर दिया। तदोपरांत राजा अश्वपति के घर में पुत्री का जन्म हुआ। राजा अश्वपति ने माँ सावित्री के नाम पर अपनी पुत्री का भी नाम सावित्री रखा। devotional vat purnima history 

समय के साथ सावित्री बड़ी होती गई। सावित्री सब गुणों से सम्पन्न कन्या थी। जिस कारण राजा अश्वपति को सावित्री के योग्य वर नही मिल पा रहा था। कुछ समय पश्चात राजा ने सावित्री को स्वंय वर तलाशने के लिए भेजा। सावित्री अपने वर की तलाश में एक वन में जा पहुंची जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा दयुम्त्सेन से होती है। devotional vat purnima history 

बलबलराम जयंती की कथा एवम इतिहास

दयुम्त्सेन का राज छिन्न गया था जिस कारण साल्व का राजा अपने परिवार सहित उसी वन में बलराम जयंती की कथा एवम इतिहासरहते थे। सावित्री ने जब राजा के पुत्र सत्यवान को देखा तो सावित्री ने उन्हें पति रूप में वरण कर लिया। यह बात जब महर्षि नारद को ज्ञात हुई तो उन्होंने इस सदर्भ में राजा अश्वपति को बताया कि आपकी कन्या को वर ढूंढने में भारी भूल हुई है। राजकुमार सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा है परन्तु सत्यवान अल्पायु है एवम एक वर्ष पश्चात इनकी मृत्यु हो जाएगी।

जिससे राजा अश्पति पुनः चिंतित हो गए। उन्होंने अपनी बेटी सावित्री को समझाया कि कोई और वर चुन लो। तत्पश्चात सावित्री बोली, पिता जी आर्य कन्याए अपने पति का सिर्फ एक बार वरण करती है तथा कन्यादान भी एक बार ही किया जाता है। अब भगवान की जो इच्छा हो, मैं सत्यवान की ही अर्धांग्नी बनूँगी। devotional vat purnima history 

तत्पश्चात राजा अश्वपति ने दोनों को परिणय सूत्र में बांध दिया। सावित्री ससुराल पहुंच कर सास-ससुर की सेवा में रत हो गयी। समय के साथ वो दिन भी आ गया जिस दिन राजकुमार की मृत्यु विधि-विधान के अंतर्गत सुनिश्चित था। सत्यवान उस दिन भी जंगल में लकड़ी काटने चला गया। सावित्री भी अपने सास-ससुर से आज्ञा लेकर अपने पति के पास पहुंच गयी। सत्यवान वृक्ष पर चढ़ कर लकड़ी काट रहा था की तभी सत्यवान का सर चकराने लगा। वह तुरंत वृक्ष से निचे उतर आया। devotional vat purnima history 

उस समय सावित्री ने उसे अपने गोद में सुला लिया । तभी यम आकार सत्यवान के जीवन को लेकर जाने लगा तब सावित्री भी उसके पीछे-पीछे चल दी। यम ने मुड़कर सावित्री को जाने को कहा। सावित्री फिर भी चलती रही। तत्पश्चात यम ने कहा तुम्हे क्या चाहिए। मनवांछित फल ले लो परन्तु सत्यवान को जाने दो। सावित्री ने अपने सास-ससुर की काया राज पाट मांग ली। यम ने कहा ऐसा ही होगा। फिर यम आगे बढ़ा तो सावित्री भी पीछे-पीछे चलती रही। devotional vat purnima history 

यम ने फिर मुड़कर सावित्री को जाने के लिए कहा। सावित्री बोली मैं साथ में जाउंगी। यम ने कहा, तुम्हे और क्या चाहिए। सावित्री बोली, मुझे सौ पुत्रो की माँ बनना है। यम ने कहा तथास्तु। फिर भी सावित्री यम के पीछे चलती रही। यम ने कहा अब क्या चाहिए। तुम्हारे कहे अनुसार मैंने तुम्हे वर दे दिया अब लौट जाओ। devotional vat purnima history 

सावित्री बोली, हे यम देव पत्नी व्रता के कर्तव्य का निर्वाह कर रही हूँ। आपने तो सौ पुत्रो का माँ बनने का वरदान दे दिया परन्तु मैं पति के बिना माँ कैसे बनूँगी। अतः आप अपने दिए गए वरदान को पूरा करें। तत्पश्चात यम सत्यवान के प्राण को पाश से मुक्त कर दिया। सावित्री अपने पति के प्राण को लेकर उस वृक्ष के नीचे पहुंची devotional vat purnima history 

तब सत्यवान जीवित हो उठा। दोनों हर्षित होकर अपने माता-पिता के पास पहुंच कर उन्होंने देखा की माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। चिरकाल तक सावित्री तथा सत्यवान सुख भोगते रहे।

वट सावित्री पूजा महत्व devotional vat purnima history 

पीपल की भांति वट वृक्ष का भी विशेष महत्व है। इस व्रत को करने से सौभाग्य एवम संतान की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु एवम महेश का वास होता है। वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा सुनने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती है। devotional vat purnima history 

वट सावित्री पूजन विधि devotional vat purnima history 

वट सावित्री व्रत के दिन माँ सावित्री के साथ यम देव की भी पूजा करना चाहिए। सावित्री ने इस तिथि को मृतक पति को धर्मराज यम से पुनः जीवित करने का वर प्राप्त की थी। जिससे सावित्री का पति सत्यवान जीवित हो उठा था। इस दिन व्रती को मिटटी से निर्मित माँ सावित्री तथा यमराज की प्रतिमा का पूजन विधि-विधान पूर्वक करना चाहिए। devotional vat purnima history 

वट सावित्री की पूजा वट वृक्ष के नीचे करना चाहिए। माँ सावित्री की पूजा रोली, केसर, सिंदूर, धुप-चन्दन आदि से करे एवम सटी सावित्री की कथा सुनें। इस प्रकार वट सावित्री की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए माँ सावित्री की जय। devotional vat purnima history 
( प्रवीण कुमार )

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