नागपंचमी का पौराणिक कथा एवं इतिहास history-of-nagpanchmi

Nag-Panchamiनागपंचमी का पौराणिक कथा एवं इतिहास : सत्य सनातन धर्म (आज के हिन्दू) ग्रन्थों व पुराणों के अनुसार, राक्षसों और देवताओं में संधि के उपरांत दोनों ने मिलकर समुद्र मंथन किया । इस मंथन से अनेकों तत्व सहित अत्यन्त श्वेत उच्चैःश्रवा नमक  एक अश्व भी निकला। जिसे देखकर नाग माता कदू्र अपनी सौतन विनता को बोली की देखो, यह अश्व सफेद है, परन्तु इसके बाल काले दिखाई पड़ते हैं। विनता ने कहा  नहीं, न तो यह अश्व श्वेत रंग का है न ही काला। इतना सुनकर कदू्र ने बोली आप मेरे साथ चाहो तो शर्त लगा लो जो भी शर्त हारेगी वो दूसरे की दासी बन होगी ।
विनता सत्य बोल रही थी अतएव उसने शर्त स्वीकार कर ली। तदोपरांत दोनों अपने स्थान पर चली गईं। उधर कदू्र ने अपने पुत्र नागों को बुला कर और सारा वृतान्त सुनाया और बोली कि आप सभी सूक्ष्म रूप के होकर इस अश्व से चिपक जाओ जिससे  मैं शर्त जीतकर विनता को दासी बना सकूं। अपनी माता के कथन सुनकर नागों ने बोला – मां हम आपका साथ नहीं दे सकते चाहे आप शर्त जीतो या हारो, परन्तु हम इस प्रकार छल नहीं करेंगे।
कदू्र ने कहा- तुमने मेरी बात नहीं मानी ? इसका दंड झेलने के लिए तैयार रहो मैं तुम्हें श्राप दे रही हूँ कि ‘पांडवों के वंशज  जनमेजय द्वारा जब सर्प यज्ञ किया जायेगा, तब तुम सब उस हवन अग्नि जल जाओगे। माता का श्राप सुन सभी घबरा गए  और बासुकि नाग को साथ लेकर ब्रह्म लोक  ब्रह्मा जी के पास गए और आप बीती घटना कह सुनाई। ब्रह्मा जी ने बोले – चिन्ता न करो, यायावर वंश में एक तपस्वी जरतकारु नामक ब्राह्मण का जन्म होगा। उसके साथ तुम्हारी बहन का विवाह होगा। उन दोनों का के घर आस्तिक नमक विख्यात पुत्र जन्म लेगा, वह जनमेजय द्वारा सर्प यज्ञ को रोक कर तुम्हारी रक्षा करेगा।
ब्रह्मा जी ने श्रावण शुक्ल पंचमी पंचमी के दिन ये वरदान  दिया था तथा आस्तिक मुनि ने भी उक्त कथानुसार  पंचमी को ही इन नागों की रक्षा की थी। इस लिए  तब से नागपंचमी की तिथि नाग वंश को अत्यन्त प्रिय है। कहते हैं जो लोग श्रावण शुक्ल पंचमी को व्रत कर नागों की पूजा करते हैं । बारह मास तक चतुर्थी तिथि को एक बार भोजन कर पंचमी को व्रत करते हैं एवं १२ प्रमुख नाग क्रमश अनंत, बासुकि, शंख व पद्म, कंबल, कर्कोटक तथा अश्वतर, घृतराष्ट,शंखपाल, एवं कालिया, तक्षक, और पिंगल इन सभी  नागों की बारह माह में क्रमशः पूजा विधान के साथ करते है। जिस यज्ञ विधान से जनमेजय अपने पिता परीक्षित के लिए यज्ञ  किया था।

जो कोई नाग पंचमी के दिन श्रद्धापूर्वक यह व्रत करता है उसे शुभफल सहित सर्प भय दूर हो जाता है । यह भी माना जाता है की इस दिन नागों को दूध से स्नान-पान कराने  नाग देव अभय दान देते हैं ।उनके परिवार में सर्पभय दूर हो जाता है। ऐसे जातक पर से वर्तमान में  कालसर्पयोग भी क्षीण हो जाता है। राजस्थान में नाग पंचमी अर्थात श्रावण कृष्ण पंचमी को नाग के प्रतीक के रूप में चांदी या तांबे की सर्प प्रतिमा न हो तो रस्सी में सात गांठें लगाकर नाग देव को प्रतीक मान कर पूजा की जाती है। सर्प की बाम्बी ( बिल ) का भी पूजन किया जाता है और दूध लावा  चढ़ाया जाता है। इसके आलावा बाम्बी की मिट्टी घर में लेट हैं और कच्चा दूध मिलाकर चक्की-चूल्हे आदि पर सर्प अकृतिबनाते हैं। शेष मिट्टी में अन्न के बीज मिला कर खोतों में बोते हैं, जिसे खत्ती गाड़ना कहा जाता है । इस दिन भोजन में  भीगा हुआ बाजरा और मौठ खाने का परम्परा है। इस तरह नाग पंचमी का पूजा वर्त सम्पन होता है।  प्रेम से बोलिए सत्य सनातन की जय हो।

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