कांवड़ यात्रा सावन मेला 2017 Live



kawad yatra sawan mela
इस वर्ष कांवड़ यात्रा की शुरूवात कल अर्थात 19 जुलाई से प्रारम्भ होगी। जो 1 अगस्त तक चलेगी। दिल्ली और आस-पास के क्षेत्र में कांवड़िया हरिद्वार में शिवजी का जलाभिषेक करते है। ये कांवड़ तिथि कल से प्रारम्भ होकर 1 अगस्त को समाप्त हो जाएगी। kawad yatra sawan mela 

जबकि उत्तर भारत के अन्य राज्यों में जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश सहित अन्य प्रदेशों में सावन का माह 20 जुलाई से प्रारम्भ होकर 18 अगस्त को समाप्त होगा। kawad yatra sawan mela

1 अगस्त 2016 सावन शिवरात्रि तथा कावड़ यात्रा समापन kawad yatra sawan mela

कांवड़ प्रारंभ तिथि : 19 जुलाई 2016
दूसरा दिन : 20 जुलाई 2016
तीसरा दिन : 21 जुलाई 2016
चौथा दिन : 22 जुलाई 2016
पांचवा दिन : 23 जुलाई 2016
छठा दिन : 24 जुलाई 2016
सांतवा दिन : 25 जुलाई 2016
आठवां दिन : 26 जुलाई 2016 सावन सोमवारी पूजा
नौवा दिन : 27 जुलाई 2016
दसवां दिन : 28 जुलाई 2016
ग्यारहवा दिन : 29 जुलाई 2016
बारहवां दिन : 30 जुलाई 2016
तेरहंवा दिन : 31 जुलाई 2016
चौदंहवा दिन : 1 अगस्त 2016 सावन शिवरात्रि तथा कावड़ यात्रा समापन

सावन शिवरात्रि की कथा एवम इतिहास

कांवड़ कथा kawad yatra sawan mela




 

वेदों, पुराणों एवम शास्त्रों के अनुसार सावन का महीना भगवान शिव जी को समर्पित है। भगवान शिव जी सावन के महीने में अपने निवास स्थान कैलाश पर्वत का त्याग कर शिवालयों में विराजमान होते है।

ग्रंथों में ऐसा वर्णित है कि माँ पार्वती शिव जी को प्रसन्न करने हेतु सावन महीने में व्रत किया करती थी। अतः सावन महीने में शिव जी के भक्ति और सेवा करने से व्रती को मनोवांछित फल प्राप्त होता है। विशेषकर अविवाहित स्त्री के लिए सावन महीना अति महत्वपूर्ण है।

शास्त्रों के अनुसार सावन के महीने में शिव जी की पूजा करने से व्रती के सभी प्रकार का कष्ट दूर हो जाता है। विवाहित स्त्री अपने सौभाग्य और सुखी जीवन के लिए ये व्रत करती है, तथा अविवाहित स्त्री कुशल और गुणवान पति के लिए सोमवार का व्रत करती है।

हिन्दू धर्म में सावन के महीने में कांवड़ यात्रा भी की जाती है। ये परम्परा सदियों पुरानी है। मान्यता है की जब भगवान शिव जी कैलाश त्याग कर शिवालयों में विराजमान होते है। उस समय में कावड़ यात्रा की जाती है। देश भर के सभी प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त शिव मंदिरों में कावड़ यात्रा की जाती है।

कांवड़ यात्रा जीवन के यात्रा के स्वरूप को दर्शाता है

कांवड़ शब्द की उतपत्ति संस्कृत भाषा के ‘कांवारथी’ से हुई है। जो बांस की फट्टी की बनी होती है। जिसे बहंगी भी कहते है। बहंगी में जब गंगाजल का भार और वैदिन अनुष्ठान को जोड़ा जाता है। ततपश्चात ये कावड़ कहलाती है। भक्तगण अपने कावड़ को फूलमाला, घुंघरू और घंटियों से सजाते है। जिससे कावड़ अति सुन्दर दिखती है।

शास्त्रों के अनुसार कांवड़ यात्रा की शुरुआत त्रेता युग में लंकाधिपति राजा रावण ने की थी। जिसके पश्चात मर्यादा पुरषोत्तम राम जी ने कावंड़ यात्रा की थी। कांवड़ यात्रा के दौरान व्रती को कठिन व्रत विधि तथा नियमों का पालन करना होता है।

यात्रा के दौरान व्रती को वैराग्य जीवन व्यतीत करना होता है। व्रती को ब्रह्मचर्य जीवन, अंतरात्मा को शुद्ध रखना, सात्विक आहार लेना और नैसर्गिक दिनचर्या का पालन करना पड़ता है।

कांवड़ यात्रा कई प्रकार के होते है
सामान्य कांवरिया
डाक कांवरिया
खड़ी कांवरिया
दांडी कांवरिया

सामान्य कांवरिया -ये वो कांवरिया होते है जो अपनी यात्रा के दौरान आराम भी कर सकते है। कांवरिया आराम करने के समय अपने कांवड़ को किसी ऊँची चीज़ से बांध कर रखते है, ताकि कांवड़ जमीन को स्पर्श न करें।

डाक कांवरिया- डाक कांवड़ यात्रा में कांवरिया को यात्रा की शुरुवात से जलाभिषेक तक लगातार चलना पड़ता है। इसके अतिरिक्त कांवरिया को एक निश्चित अवधि में जलाभिषेक करना होता है। यात्रा के दौरान व्रती को शरीर से उत्सर्जन क्रियाएं तक वर्जित होती हैं।

खड़ी कांवरिया-कुछ कांवरिया खड़ी कांवड़ लेकर चलते है। यात्रा में उनकी मदद के लिए सहयोगी उनके साथ चलते है। जो यात्रा में सहयोग करता है। जब खड़ी कांवरिया आराम करते है, उस वक्त ये सहयोगी अपने कंधे पर कांवड़ लेकर गति मुद्रा में रहते है।

दांडी कांवड़ – ये वो कांवरिया होते है जो नदी तट से शिवालय तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते है। दांडी कांवड़ का तात्पर्य है ये भक्त यात्रा के दौरान अपने शरीर की लंबाई से लेटकर नापते हुए दुरी को पूरी करते है। यह यात्रा अत्यधिक कठिन है, इसे पूर्ण करने में एक महीने का समय भी लग जाता है।

शिवालय पहुँच कर व्रती भगवान शिव जी का जलाभिषेक करते है। कांवड़ यात्रा जीवन के यात्रा के स्वरूप को दर्शाता है, जिसका उद्देश्य जीवन में अनुशासन, वैराग्य और सात्विकता के साथ ईश्वर के पास पंहुचना है।
( प्रवीण कुमार )

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