12 अप्रैल 2018 को वल्लभाचार्य जयंती है,जानिए वल्लभाचार्य जी की जीवनी

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हिंदी पंचांग के अनुसार वल्लभाचार्य जयंती वैशाख माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है जबकि तमिल पंचांग के अनुसार यह जयंती चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। तदनुसार इस वर्ष शनिवार 12 अप्रैल 2018  को वल्लभाचार्य जयंती मनाई जाएगी। इस पर्व को गुजरात, महाराष्ट्र, चेन्नई, उत्तर प्रदेश सहित देश भर में वरुथिनी एकादशी के दिन मनाया जाता है। इस दिन मंदिरो में विशेष आयोजन किया जाता है। उनके उपदेशो को लोगो के बीच बाँटा जाता है। यह पर्व पुरे देश में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। know vallabhachary life story

वल्ल्भाचार्य जयंती की कथा

वल्लभाचार्य के पिता लक्ष्मण भट्ट और उनकी माता इल्लमागरू ने गुरु के कहे अनुसार 95 यज्ञ किये तथा 5 और यज्ञ के लिए दोनों तीर्थ पर निकले थे। लक्ष्मण भट्ट उत्तर भारत का भर्मण करते हुए वाराणसी पहुंचे जहॉ उन्होंने बचे पांचो यज्ञ किया परन्तु पूर्णाहुति के दिन सांप्रदायिक तनाव के कारण यज्ञ की पूर्णाहुति नहीं कर सके तथा उस स्थान को छोड़ मध्यप्रदेश के रायपुर जा पहुंचे। भय तथा आतंक में उनकी पत्नी इल्लमागरू ने मानसिक तनाव और शारीरिक तकलीफ में चम्पारण्य स्थान पर एक शिशु को जन्म दिया जो मरणासन्न स्थिति में था। know vallabhachary life story

वैशाख अमावस्या का महत्व एवम इतिहास

माता-पिता ने दुखी मन से उसे वही पर छोड़ दिया और अपने पुश्तैनी गाँव की ओर लौट गए। रास्ते में उस रात माता इल्लमागरू के सपने में भगवान आये और उनसे बोले। जिसे तुमने मृत समझ पेड़ के नीचे छोड़ आयी हो वो और कोई नही मैं हूँ। उस स्वप्न के पश्चात वल्लभाचार्य के माता-पिता भाग कर स्थान पर गए जहाँ पर उन्होंने वल्लभाचार्य को छोड़ आया था। वहाँ का दृश्य देखकर माता-पिता आश्चर्य चकित हो गए। वल्लभाचार्य के सुरक्षार्थ में चारो तरफ आग लगी है तथा उस अग्नि के बीच में वल्लभाचार्य मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। माता-पिता ने इनका नाम वल्लाह रखा जो बाद में वल्लभाचार्य संत कहलाए। know vallabhachary life story




वल्ल्भाचार्य जयंती

कथानुसार एक बार वल्ल्भाचार्य जी ने देखा कि एक गाय प्रतिदिन पहाड़ो के एक निश्चित स्थल पर प्रतिदिन दूध देती है। वल्ल्भाचार्य जी उस स्थान पर इस शुभ कार्य को देखने जाते थे परन्तु उन्हें समझ नही आता था की आखिर क्यों गऊ माता प्रतिदिन इसी स्थान पर दूध देती है। ततपश्चात उन्होंने इस स्थान पर खुदाई की तो उन्हें श्री नाथ अर्थात भगवन श्री कृष्ण जी की प्रतिमूर्ति प्राप्त हुई। तबसे वल्ल्भाचार्य जी ने उस स्थान पर पूजा-पाठ करने लगे। ऐसा माना जाता है की वल्ल्भाचार्य जी श्री नाथ जी की पूजा करने वाली प्रथम संत थे। know vallabhachary life story

वल्लभाचार्य उपदेश

भक्तिमार्ग में भक्त भगवान के स्वरूप के दर्शन के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु के लिए प्रार्थना नही करता है। भक्त तन, मन सबकुछ उस महामहिम जगदीश को सौप देता है। वल्लभाचार्य ने इस आधार पर भगवान की भक्ति की तथा लोगो में भी इस मूल मन्त्र का उपदेश दिया। इसका वर्णन उपनिषदों में भी किया गया है। वल्लभाचार्य ने प्रत्येक जीव को परमात्मा का अंश माना है। उनके अनुसार परमात्मा अंश मात्र में प्रत्येक जीव में व्याप्त है। उनके स्वरूप से समस्त जीव-जगत हमारे बीच मौजूद है। हमलोग भी परमात्मा के अंश है। इसलिए किसी भी जीव को कष्ट देना या प्रताड़ित करना गलत तथा अमानवीय है। know vallabhachary life story

वल्लभाचार्य जयंती के दिन उनके अनुयायी मंदिरो को फूलो से सजाते है। प्रातः काल में भगवान श्री कृष्ण जी की पूजा-आरती की जाती है तथा पुरे दिन भगवान श्री कृष्ण जी के नाम पर भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। इस दिन भगवान के मूर्ति की झांकिया निकाली जाती है। झांकी पुनः मंदिर पहुचती है। इसके पश्चात भक्तो के बीच में प्रसाद वितरण किया जाता है। इस प्रकार वल्लभाचार्य जयंती की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए बाँके बिहारी लाल कृष्ण कनैहया की जय। know vallabhachary life story
( प्रवीण कुमार )

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