पौष पुत्रदा एकादशी की कथा एवं इतिहास

Pausha Putrada Ekadashi vrat katha



सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, साल में 24 एकादशी होती है और हर महीने में 2 एकादशी होती है। पौष माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी तथा शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते है।भगवान श्री कृष्ण जी ने इस एकादशी की कथा, महत्व एवम पूजा विधि युधिष्ठिर को बताया था। इस व्रत के मात्र कथा सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 

पुत्रदा एकादशी के दिन दीप दान का भी विधान है यह संध्याकाल में किया जाता है। ‘रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण कर भगवान विष्णु जी का भजन-कीर्तन करना चाहिए। यह सब पापो को हरनेवाली तथा संतान प्राप्ति का व्रत है और इस सिद्धियों के दाता भगवान विष्णु जी है। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 

पुत्रदा एकादशी की कथा

एक समय की बात है भद्रावतीपुरी राज्य में राजा सुकेतुमान और रानी चंपा राज्य किया करते थे। राजा की कोई संतान ना थी जिस कारण राजा-रानी सदा शोक और चिंता में डूबे रहते थे। राजा हमेशा यह सोचता रहता था की हमारे बाद इस राज का कौन वारिश बनेगा और पितरो को तर्पण कौन करेगा यह सब सोच-सोच कर राजा सुकेतुमान चिंतित रहते थे। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 

एक दिन राजा सुकेतुमान घोड़े पर सवार हो वन में भर्मण करने निकले और वन में दूर निकल गए और इस बात की खबर किसी को ना थी। राजा सुकेतुमान उस घने जंगल में भर्मण करने लगे। राह में जंगली जीव उनके इर्द -गिर्द घूम रहे थे, राजा सुकेतुमान वन की शोभा देखने में मग्न हो गए इतने में दोपहर का वक्त हो गया अब राजा सुकेतुमान को भूख और प्यास सताने लगी। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 




राजा सुकेतुमान जल और भोजन की खोज में इधर-उधर भटकने लगे तभी उन्हें एक उत्तम जलाशय दिखाई दिया जिसके समीप मुनियो के ढेर सारे आश्रम थे। राजा सुकेतुमान ने उस आश्रम को देखा वहां कई ऋषि मुनि गण थे तभी राजा सुकेतुमान का दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ फड़कने लगा जो शुभ समय की सुचना दे रहा था। उस जलाशय के समीप ढेर सरे ऋषि गण वेद का पाठ कर रहे थे यह देखकर राजा सुकेतुमान को बड़ा हर्ष हुआ। यह सब देख राजा सुकेतुमान घोड़े से उतर कर बारी-बारी से ऋषि गण को नमस्कार किया तब मुनि बोले, तथास्तु राजन। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 

राजा सुकेतुमान बोले, आप लोग कौन है और किस उद्देश्य से आपलोग इस जलाशय के समीप एकत्र हुए है ? मुनि बोले, हमलोग विश्वदेव है माघ स्नान के लिए इस जलाशय के समीप आये है आज से पांच दिन बाद माघ स्नान प्रारम्भ हो जायेगा। आज पौष पुत्रदा एकादशी है इस व्रत के करने से पिता को पुत्र की प्राप्ति होती है। राजा सुकेतुमान ने मुनियो से इस व्रत के करने की विधि के बारे में पूछा। मुनि बोले, इस व्रत को करने से भगवान केशव प्रसन्न होते है और केशव भक्ति से प्रसन्न हो आपको अवश्य पुत्र प्राप्ति का वर देंगे। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 

भगवान कृष्ण जी कहते है इस प्रकार राजा सुकेतुमान ने मुनियो को प्रणाम कर अपने राज्य को वापस आ गया और ऋषियों के कथानुसार विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी का अनुष्ठान किया और द्वादशी को पारण कर व्रत को समाप्त किया। एक साल के उपरांत राजा सुकेतुमान के घर में एक नन्हे से राजकुमार का आगमन हुआ जो आगे चलकर भद्रावतीपुरी राज्य का राजा बना। भगवान श्री कृष्ण जी कहते है, राजन पुत्रदा एकादशी का व्रत उत्तम फल देने वाला होता है। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 

पौष पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि और महत्व

भगवान कृष्ण ने पुत्रदा एकादशी के महत्व को बताया की इस व्रत के देवता नारायण हरी श्री विष्णु जी है जिस व्यक्ति को संतान सुख की इच्छा रहता है उसे पौष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करना चाहिए। व्रतधारी को एक दिन पूर्व अर्थात शुक्ल पक्ष की दशमी के दिन लहसुन,प्याज से रहित भोजन ग्रहण करना चाहिए। Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 

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एकादशी के दिन स्नान आदि से निवृत होकर विधि-विधान से पूजा करना चाहिए तथा संध्याकाल में दीप दान करना चाहिए इससे श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है। जो भक्त इस व्रत को करते है उन्हें दिन भर निराहार रहना चाहिए तथा संध्याकाल में चाहे तो फलाहार कर सकते है। इस तरह पौष पुत्रदा एकादशी की कथा सम्पन्न हुई। भक्तगण प्रेम से बोलिए भगवान श्री हरी विष्णु जी की जय।  Pausha Putrada Ekadashi vrat katha 
( प्रवीण कुमार )

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