12 जनवरी 2018 को षटतिला एकादशी है,जानिए व्रत की कथा एवं इतिहास

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हिंदू धर्म के वेदो, पुराणो और शास्त्रो के अनुसार एकादशी व्रत का अति महत्वपूर्ण अभिप्राय है तथा हिन्दू पंचांग के मतानुसार प्रत्येक वर्ष में 26 एकादशी पर्व पड़ता है जबकि मलमास या अधिमास में इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। वर्ष के प्रत्येक माह में 2 एकादशी व्रत मनाई जाती है एवम प्रत्येक एकादशी का विशेष महत्व है। पद्म पुराण के अनुसार माघ माह, कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी मनाई जाती है। तदानुसार, शुक्रवार 12 जनवरी 2018 को षटतिला एकादशी मनाई जाएगी। षटतिला एकादशी व्रत के करने से व्रती की  सम्पूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण होती है। shattila ekadashi vrat katha 

षटतिला एकादशी की कथा

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक बार देवर्षि नारद त्रिलोक भ्रमण करने के पश्चात वैकुण्ठ धाम भगवान श्री हरि विष्णु के निकट पहुंचे। वैकुण्ठ धाम में देवर्षि नारद ने भगवान श्री हरि विष्णु तथा माँ महालक्ष्मी को अभिवादन किया तथा जिज्ञासा व्यक्त करते हुए प्रश्न किया। shattila ekadashi vrat katha 

हे प्रभु, षट्तिला एकादशी व्रत, महत्व और पूजन विधि के बारे में बताएं एवम इस व्रत को करने से कैसा फल और पुण्य प्राप्त होता है ?

कृपा करके बताएं।

देवर्षि नारद द्वारा विनीत भाव से किये गए प्रश्न पर लक्ष्मीपति भगवान श्री हरि विष्णु जी ने कहा, एक समय की बात है जब पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहता थी। ब्राह्मणी मेरी पूजा और भक्ति किया करती थी तथा मेरे निमित्त नाम से प्रत्येक व्रत को किया करती थी। shattila ekadashi vrat katha 

एक बार उसने भक्ति के भाव को एक माह तक कठिन व्रत कर प्रस्तुत किया। व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी नारी का शरीर तो शुद्ध हो गया परन्तु ब्राह्मणी नारी कभी अन्न-दान नही किया करती थी। जिस कारण ब्राह्मणी वैकुण्ठ धाम में भी अतृप्त रहती। ब्राह्मणी नारी के मन संशय को दूर करने मैं स्वयं ब्राह्मणी नारी के आश्रम जा पंहुचा। shattila ekadashi vrat katha 

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मैंने ब्राह्मणी नारी से जब भिक्षा की याचना किया तब ब्राह्मणी नारी ने मिटटी का एक छोटा सा टुकड़ा मेरे हाथो पर भिक्षा के रूप में दिया जिसे लेकर मैं वैकुण्ठ धाम लौट आया। कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी नारी शरीर को त्याग कर जब वैकुण्ठ धाम आई तब उसे एक खाली आश्रम और आम का एक वृक्ष मिला। ब्राह्मणी नारी घबराकर बोली, प्रभु मैं तो धर्म परायण हूँ फिर मुझे केवल एक वृक्ष और आश्रम क्यों मिली है। shattila ekadashi vrat katha 

तत्पश्चात, मैंने उसे बताया कि हे ब्राह्मणी नारी तुमने मेरी भक्ति को किया परन्तु अन्न-दान कभी नही किया तथा जब मैं स्वंय तुम्हारे पास भिक्षा याचना किया तब तुमने केवल मिटटी का छोटा सा टुकड़ा प्रदान किया था। ब्राह्मणी नारी ने कहा प्रभु इस संकट से कैसे मुक्ति मिलेगी। shattila ekadashi vrat katha 

तब मैंने कहा ब्राह्मणी नारी जब देव कन्याएँ तुमसे मिलने आएं उस वक्त आश्रम का द्वार खोलना और उनके बताये गए षट्तिला एकादशी व्रत को विधि- विधान से करना। भगवान विष्णु जी के वचनो को पालन करते हुए ब्राह्मणी ने उन देवकन्या से षट्तिला एकादशी के बारे में पूछा तथा उनके बताये गए निर्देशो के अनुसार षट्तिला एकादशी का व्रत किया। जिससे ब्राह्मणी का आश्रम अन्न से भर गया। अतः देव्रर्षि नारद इस बात को ध्रुव सत्य मानो की जो व्यक्ति इस एकादशी व्रत को विधि -विधान से करता है उसे वैभव और मुक्ति की प्राप्ति होती है।  shattila ekadashi vrat katha 

व्रत एवम पूजा विधि

माघ का महीना अति पावन और पवित्र होता है तथा इस माह में तप, पूजा और दान का विशेष महत्व है। माघ माह, कृष्ण पक्ष की एकादशी की दिन मनुष्य को भगवान विष्णु के निमित्त व्रत करना चाहिए। व्रती को पुष्प, गंध, धुप-दीप तथा ताम्बूल प्रसाद आदि से भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा करना चाहिए। shattila ekadashi vrat katha 

षट्तिला एकादशी के दिन उड़द और तिल मिश्रित खिचड़ी को बनाकर भगवान को भोग लगाए एवम रात्रि में तिल से 108 बार ॐ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा मन्त्र का उच्चारण करते हुए हवन करें।

षट्तिला एकादशी का फल

इस दिन तिल को छः रूप में विभाजित कर दान करने से उत्तम फल प्राप्त होता है। प्राचीन ऋषि के द्वारा बताये गए 6 प्रकार निम्न है

1 तिल का उबटन
2 तिल का तिलक
3 तिल से हवन
4 तिल मिश्रित जल का सेवन
5 तिल का भोजन
6 तिल जल से स्नान।

इस प्रकार जो मनुष्य षट्तिला एकादशी का व्रत करता है। भगवान श्री हरि विष्णु की कृपा से उसके सभी पाप कट जाते है तथा स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस कथन को सत्य मानकर जो षट्तिला एकादशी का व्रत करता है। प्रभु, व्रती का निश्चित ही उद्धार करते है। व्रती गण इस तरह षट्तिला एकादशी की कथा संम्पन्न हुई। भक्त गण प्रेम से बोलिए भगवान श्री हरि विष्णु जी की जय।  shattila ekadashi vrat katha 
( प्रवीण कुमार)

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