वट सावित्री पूजा वर पूजा की कथा एवं इतिहास

वट सावित्री पूजा का शुभ योग बनता है। वैसे अमावस्या और पूर्णिमा चंद्र कैलेंडर में त्योहारों से अधिकांश एक ही दिन पर हो जाता हैं। पूर्णिमा कैलेंडर को मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में उत्तर भारतीय राज्यों में मन जाता है। कुछ अन्य राज्यों में आम तौर पर अमावस्या चंद्र कैलेंडर का पालन किया जाता है। हालांकि वट सावित्री व्रत एक अपवाद के रूप में माना जा सकता है। क्योकि पूर्णिमा कैलेंडर में वट सावित्री व्रत शनि जयंती के साथ मेल खाता है जो ज्येष्ठ अमावस्या के दौरान मनाया जाता है। vat savitri pooja date

जो वट पूर्णिमा व्रत के रूप में मनाया जाता है। अमावस्या कैलेंडर में वट सावित्री व्रत, ज्येष्ठ पूर्णिमा के दौरान मनाया जाता है। इसलिए महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों में विवाहित महिलाओं के 15 दिन बाद उत्तर भारतीय महिलाओं की तुलना में वट सावित्री व्रत मानते करते हैं। हालांकि व्रत के पीछे पौराणिक कथा दोनों कैलेंडर में एक हीं है। वट सावित्री पूजा वर पूजा की कथा इस प्रकार है — हिन्दू धर्म ग्रंथों एवं पुराणों के कथा के अनुसार “शती सावित्री ने अपने पति के जान को बचने के लिए यमराज को तरह – तरह के प्रश्नो में भ्रमित करके वरदान प्राप्त किया की vat savitri pooja date

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