26 मई 2019 को है भानु सप्तमी,जानिए व्रत की कथा एवं इतिहास




devotional Ratha Saptami vrat katha हिन्दू धर्म के ग्रंथो के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रथ सप्तमी मनाई जाती है। तदानुसार, 26 मई 2019  को रथ सप्तमी मनाई जाएगी। हिन्दू धार्मिक मान्यताओ के अनुसार इस दिन से भगवान सूर्यदेव ने सारे जगत को अपने प्रकाश से अवलोकित करना प्रारम्भ किया था। devotional Ratha Saptami vrat katha 

इसलिए माघ माह शुक्ल पक्ष की सप्तमी को सूर्य जयंती के रूप में भी जाना जाता है। रथ सप्तमी के दिन जो श्रद्धालु भगवान सूर्य देव की पूजा विधिवत करते है उन्हें संतान प्राप्ति, धन और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। आदिकाल में भी सूर्य देव जीवन चक्र के लिए परम सत्य है। समस्त ब्रह्माण्ड के पालन हार भगवान सूर्य देव है इनके प्रभाव से समस्त जीव लोको को पोषण प्राप्त होता है। devotional Ratha Saptami vrat katha 

सूर्य सप्तमी के अन्य नाम

सूर्य सप्तमी या रथ सप्तमी को अन्य नाम से भी जाना जाता है जिसे अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, आरोग्य सप्तमी भी कहते है। वेदो, पुराणो और शास्त्रो ने इसका उल्लेख किया है।

रथ सप्तमी या सूर्य सप्तमी की कथा

माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी अर्थात रथ सप्तमी से संबंधित कथा का उल्लेख हिन्दू ग्रंथो में मिलता है। कथानुसार, एक बार द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरिक बल और उत्कृष्टता पर अत्यधिक अभिमान हो गया था। devotional Ratha Saptami vrat katha 

जब दुर्वाशा ऋषि भगवान श्री कृष्ण जी से मिलने गए तब भगवान श्री कृष्ण जी के पुत्र शाम्ब ने दुर्वाशा ऋषि के कमजोर तन को देख कर हसने लगे। इस बात पर दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए और क्रोध की ज्वाला में जल रहे ऋषि दुर्वासा ने भगवान श्री कृष्ण के पुत्र शाम्ब को श्राप दे दिया की तुम कुष्ठ रोग से ग्रसित हो जाओगे और तुम्हारा यह बलिष्ठ तन कुरूप हो जायेगा। devotional Ratha Saptami vrat katha 

ऋषि दुर्वासा के श्राप से तत्काल प्रभाव दिखने लगा और भगवान श्री कृष्ण जी के पुत्र शाम्ब कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया। शाम्ब के शरीर की प्राकृतिक जड़ी बूटियों से उपचार किया गया परन्तु ऋषि दुर्वासा के श्राप के प्रभाव को कम ना कर सका। तत्पश्चात, भगवान श्री कृष्ण जी ने अपने पुत्र शाम्ब को भगवान सूर्य भगवान की उपासना करने के लिए कहा। devotional Ratha Saptami vrat katha 

पिता के आज्ञा का पालन करते हुए शाम्ब भगवान सूर्य देव की उपासना करने लगे। कुछ समय पश्चात शाम्ब कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया। प्राचीन काल में राजा हर्षवर्धन के दरबारी कवि मयूर भट्ट कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गए थे। उन्होंने भी सूर्य देव की आराधना कर इस रोग से मुक्ति पाई थी। राजा हर्षवर्धन के दरबारी कवि मयूर भट्ट ने सूर्य सप्तक ग्रन्थ की रचना की है। devotional Ratha Saptami vrat katha 

रथ आरोग्य सप्तमी व्रत विधि

रथ सप्तमी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठे, स्नानादि से निवृत होकर भगवान सूर्य देव को सर्वप्रथम अर्ध्यदान (चावल, तिल, दूर्वा, चंदन जल में डालकर ) तथा उनकी आराधना करे। तत्पश्चात शुद्ध घी के दिए जलाकर ऊँ घृणि सूर्याय नम:” अथवा “ऊँ सूर्याय नम:” मंत्रो उच्चारण कर उनका आह्वान करे। पूजन समाप्ति के पश्चात अपने सामर्थ्य अनुसार दान करे। दान में वस्त्र, भोजन तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं भी  और गरीबो को दे सकते है। devotional Ratha Saptami vrat katha 

रथ सप्तमी का महत्व

रथ सप्तमी के दिन उपासक भगवान सूर्य देव की उपासना करते है और अपनी श्रद्धा तथा भक्ति से उन्हें प्रसन्न करते है। धार्मिक ग्रंथो के अनुसार सूर्य देव की उपासना से शरीर में अरोयगता प्राप्त होती है तथा यह व्रत आरोग्यकारक माना जाता है। रथ सप्तमी के उपासना से संतान की प्राप्ति होती है तथा उपासक के जीवन में धन, सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। devotional Ratha Saptami vrat katha 

षटतिला एकादशी की कथा एवं इतिहास

वैज्ञानिक तौर पर भी सूर्य की किरणे सभी जीवो को लिए लाभकारी है। सूर्य की किरणों से विटामिन डी प्राप्त होती है जिससे शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है। चिकित्सा पद्धति में भी सूर्य किरणों को उपयोग किया जाता है। जिन व्यक्तियों को शारीरिक दुर्बलता होती है उन्हें भगवान सूर्य देव की उपासना करना चाहिए। उनकी आराधना से साधक को रोग से मुक्ति मिलती है। devotional Ratha Saptami vrat katha 

चर्म रोग से ग्रसित व्यक्ति को सूर्य देव की दिशा में मुख कर सूर्य देव की स्तुति करने से शारीरिक चर्म रोग से मुक्ति मिलती है। संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत अति मत्वपूर्ण है तथा इस व्रत के करने से पिता-पुत्र में स्नेह और प्रेम बना रहता है। इस तरह रथ सप्तमी की कथा सम्पन्न हुई। प्रेम से बोलिए भगवान सूर्य देव की जय।  devotional Ratha Saptami vrat katha 
( प्रवीण कुमार )

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