संकष्टी चतुर्दशी की कथा एवं इतिहास history of sankashti chaturdashi

Happy-Ganesh-Chaturthi-2016संकष्टी चतुर्दशी की कथा  एवं इतिहास

सोमवार 28 दिसंबर 2015

धार्मिक धारणा है की हिन्दू धर्म में भगवान श्री गणेश की पूजा से प्रत्येक शुभ कार्य आरम्भ किया जाता है।  भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है।  सनातन धर्म में २४ दिन ऐसे होते है जो पूर्णतः भगवान गणेश की आराधना के लिए समर्पित है। अतः वर्ष की हर माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है जिसमे भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है।

संकष्टी चतुर्दशी की कथा

शिव रहस्य पुराण के अनुसार भगवन गणेश जी शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान शिव जी एवं माता पार्वती के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। शिव पुराण में कहा गया है कि देवी गिरिजा ने भगवान को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए १२ वर्षो तक कठिन तपस्या, व्रत एवं साधना किया जिसके फलस्वरूप शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के दिन मध्यान में स्वर्ण कांति से युक्त भगवान गणेश जी प्रकट हुए थे।  अतः ब्रह्मा जी ने चतुर्दशी व्रत को अतिश्रेष्ठ व्रत बताया है।

संकष्ट चतुर्दशी पूजन विधि।

वर्ष के प्रत्येक माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को संकष्ट चतुर्दशी मनाई जाती है। इस दिन संध्याकाल में स्नान आदि से निवृत्त होकर गणेश जी की पुष्प, अक्षत, शुद्ध जल, पंचामृत, धुव से पूजा आराधना करना चाहिए। आरती तथा पुष्पांजलि अर्पित कर प्रदक्षिणा करना चाहिए। पूजा समाप्ति के समय भगवान विघ्नहर्ता से सुख और मंगल की कामना करे। भगवान गणेश भक्तो की सारी मनोकामना पूर्ण करते है। इस दिन संध्याकाल में चन्द्र दर्शन करने के पश्चात भोजन ग्रहण करे। इस तरह संकष्टी चतुर्दशी की कथा सम्पन्न हुयी। भक्त गण प्रेम से बोलिए गणपति बप्पा मोरया। संकष्टी चतुर्दशी की कथा  एवं इतिहास history of sankashti chaturdashi

( प्रवीण कुमार )

 

 

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