24 अक्टूबर 2018 को है मीराबाई जयंती,जानिए मीराबाई जी की जीवनी

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कृष्ण भक्त और कवियत्री मीराबाई का जन्म राजस्थान, जोधपुर के मेड़ता परिवार में 1504 ई में हुई थी। इनके पिता जी का नाम रतन सिंह था जो मेड़ता महाराज के छोटे भाई थे। मीराबाई का बचपन बड़े ही दुःख और कष्ट में व्यतीत हुआ। know mirabai life story

मीराबाई जब केवल दो वर्ष की थी तो इनकी माता की मृत्यु हो गई। माता की मृत्यु के बाद इनका लालन-पालन इनके दादा राव दूदा के देखरेख में हुआ। दूदा राव एक योद्धा के साथ-साथ धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे। जिस कारण उनके निवास पर साधु संतों का आना-जाना लगा रहता था। मीराबाई बचपन से ही धार्मिक लोगों के सम्पर्क में आती रही। धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ तीर-तलवार, घुड़सवारी, शस्त्र, संगीत और आध्यात्मिक शिक्षा भी मीराबाई ने पाई। know mirabai life story 

कृष्ण से लगाव know mirabai life story 

धार्मिक मान्यता के अनुसार मीराबाई द्वापर युग में राधा जी की सखी थी और यह प्रेम जन्म जन्मान्तर था। मीराबाई द्वापर युग में राधा जी की सहेलियों में से एक थी और मन ही मन भगवान श्री कृष्ण जी से प्रेम करती थी। इनका विवाह एक गोप से हुई थी। किन्तु विवाह के पश्चात भी गोपिका का कृष्ण प्रेम समाप्त नहीं हुआ। सास को जब इस बात की खबर हुई तो उसने राधा की सहेली को घर में बंद कर दिया। भगवान श्री कृष्ण जी की तड़प में गोपिका ने अपने प्राण त्याग दिए। know mirabai life story 

जानिए महर्षि वाल्मीकि जी की जीवनी

भक्ति काल के समय 1504 ई में मीराबाई जोधपुर के पास मेड़ता गाँव में राठौर रतन सिंह के घर जन्म लिया। बाल्य काल से मीराबाई के मन में कृष्ण की छवि बसी थी जो उनके मृत्यु तक उनके साथ रही। बाल्य काल में एक बार उनके गाँव में किसी का विवाह हो रहा था। बारात आने के समय सभी लोग दूल्हा देख रहे थे। मीराबाई भी दूल्हा देखने हेतु छत पर थी। उसी समय मीराबाई ने अपने माँ से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है ? तो उनकी माँ ने भगवान श्री कृष्ण जी की ओर इशारा कर कहा कि वो है तुम्हारा दूल्हा। मीराबाई तबसे इस बात को अपने गांठ में बांध ली और उसी समय से मीराबाई श्री कृष्ण को अपना पति समझने लगी। know mirabai life story 




विवाह

मीराबाई के गुणों को देखकर ही मेवाड़ के नरेश राणा संग्राम सिंह ने मीराबाई के घर अपने बड़े बेटे भोजराज के विवाह हेतु प्रस्ताव भेजा। जिसे रतन सिंह ने स्वीकार कर लिया था। इस विवाह हेतु पहले तो मीराबाई ने इंकार दिया था। किन्तु परिवार वालों के अत्यधिक बल देने पर वह तैयार हो गई। मीराबाई का विवाह भोजराज के साथ हुई। विवाह के समय मीराबाई फुट-फुट कर रोने लगी। किन्तु परिवार के सम्मान हेतु ससुराल चली गई। मीराबाई अपने साथ श्री कृष्ण की मूर्ति भी ले गई। know mirabai life story 

पति की मृत्यु

विवाह के दस वर्ष बाद ही मीराबाई के पति भोजराज की मृत्यु हो गई। अनुमानतः भोजराज की मृत्यु युद्ध में घायल होने के पश्चात हुई थी। भोजराज की मृत्यु के पश्चात मीराबाई के ससुराल वाले ने मीराबाई पर कई अत्याचार किए। सन 1527 ई में बाबर और राणा सांगा के बीच हुए युद्ध में मीराबाई के पिता और ससुर मारे गए। सांसारिक माया-मोह को त्याग कर मीराबाई ने परलौकिक प्रेम को अपनाया और भगवान श्री कृष्ण की भक्त बन गई। know mirabai life story 

मीराबाई को राणा विक्रमादित्य और उनके मंत्री विजयवर्गीय ने अत्यधिक कष्ट दिए। किन्तु मीराबाई इस सब चीज़ों को भूलकर श्री कृष्ण में रमी रहती थी। मीराबाई को चित्तोड़ में भोजराज की मृत्यु का कारण माना जाता था। जिस कारण परिवार और समाज से जितना विरोध सहना पड़ा उतना शायद ही किसी स्त्री या कृष्ण भक्त को सहना पड़ा हो। मीराबाई ने अपने काव्य में पारिवारिक संघर्ष के आत्मचरित मूलक उल्लेख कई स्थानों पर किए है। know mirabai life story 

राम बिरमदेव ने सन 1533 में मीराबाई मेड़ता बुला लिया। मीराबाई के चित्तोड़ त्याग के पश्चात चित्तोर पर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह का सम्राज्य स्थापित हो गया। मीराबाई की बदकिस्मती यहाँ पर भी साथ में थी। सन 1538 ई में जोधपुर के राजा राव मालदेव ने राव बीरमदेव से मेड़ता छीन लिया। बीरमदेव भागकर अजमेर चले गए। 1539 ई में मीराबाई वृन्दावन चली गई। जहां उनकी मुलाकात गोस्वामी तुलसीदास से हुई। know mirabai life story 

मीराबाई कुछ समय तक वृन्दावन में रही। सन 1546 में मीराबाई द्वारिका चली गई। मीराबाई को निर्गुण धारा भक्ति का सम्पूर्ण ज्ञान था। तत्कालीन समाज मीराबाई को तुष्ट भाव से देखता था। मीराबाई अपना अधिकांश समय भगवान श्री कृष्ण जो को समर्पित करती थी। मीराबाई भारत भर से आये साधुओं व् तीर्थ यात्रियों से मिलने और भक्ति पदों की रचना करती थी। know mirabai life story 

मृत्यु

मीराबाई उस समय से लेकर आज तक लोकप्रिय है। उनके गीत, भजन आज भी हिंदी-अहिन्दी भाषी भारतवासियों के जबां पर आज भी आरूढ़ है। वे बहुत दिनों तक वृन्दावन में रही और उसके पश्चात द्वारिका चली गई। द्वारिका में ही 1560 ई में मीराबाई श्री कृष्ण की मूर्ति में समा गई। know mirabai life story 

उनकी मृत्यु के बारें में एक मान्यता है कि राजा उदय सिंह ने एक बार जन्माष्टमी का आयोजन किया था। जिसमें मीराबाई को भी बुलाया गया था। उस दिन उत्स्व चल रहा था। भक्त गण भजन में मग्न होकर भजन-कीर्तन कर रहे थे। मीराबाई नाचते-नाचते श्री रनछेड़राय के गर्भगृह में प्रवेश कर गई और मीराबाई के मंदिर में प्रवेश करते हुए मंदिर का कपाट बंद हो गया। know mirabai life story 

जब दरवाजा खोला गया तो मीराबाई मंदिर में नहीं थी। उनका चीर अथवा वस्त्र मूर्ति के चारों ओर लिपटा हुआ था। मूर्ति अत्यंत प्रकाशित हो रही थी। मीरा बाई का शरीर कही नहीं मिला। मीराबाई भगवान श्री कृष्ण जी में समाहित हो गई थी। कृष्ण भक्त, कवियत्री, आदर्श नारी स्वरूप मीराबाई को शत-शत नमन।  know mirabai life story 
( प्रवीण कुमार )

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